Thursday, 4 July 2013

“उस मोड़ पर”

उस मोड़ पर
                   ................शिशिर कृष्ण शर्मा
                        (चित्र : वत्सला शर्मा)

(जनसत्ता सबरंग / 5 जनवरी 1997 में प्रकाशित)

चीड़ के घने जंगलों से घिरी पहाड़ी सड़क पर बस रेंगती हुई सी आगे बढ़ रही थी। जहां भी नज़र जाती थी, सिर्फ़ हरेभरे पहाड़ थे, गहरी घाटियां थीं, घाटियों में तैरते बादलों के टुकड़े थे...कुल मिलाकर दृश्य बेहद मनोरम थे।

बस में ख़ामोशी छाई हुई थी और ज़्यादातर मुसाफ़िर ऊंघ रहे थे।

रामप्यारी बेहद परेशान हो उठी थी। गेरूए कपड़े पहने वो बूढ़ा साधु अब भी बार-बार मुड़कर उसे देख रहा था। ऋषिकेश से यमुनोत्री के लिए चली बस में क़रीब आधा घंटा पहले वो धरासू से चढ़ा था और रामप्यारी ने साफ़-साफ़ देखा था कि उस पर नज़र पड़ते ही वो साधु बेतरह चौंक पड़ा था।...और तब से वो लगातार मुड़-मुड़कर तीन सीट पीछे बैठी रामप्यारी को घूरे जा रहा था।

, दुखी हो गयी मैं तो...’ - रामप्यारी ने कुसुम को कुहनी मारी।

ऊंह, ध्यान ही मत दो उधर...’ – कुसुम ने लापरवाही से कहा और फिर से आंखें मूंदकर अपना सर रामप्यारी के कंधे पर टिका दिया।

देख तो कैसे घूर रहा है...’ – धीरे से बुदबुदाते हुए रामप्यारी ने कहा और दृष्टि खिड़की से बाहर घुमा ली।

सोने दो मां’...कुसुम झल्ला पड़ी...’तुम्हीं ठहरीं इस बुढ़ापे में घूरने को’?

रामप्यारी बेबस थी। वो ख़ुद को साधु की घूरती नज़रों से बचाने की असफल कोशिशें करती रही। घने जंगलों, सीढ़ीदार खेतों और दूर-दूर बने ढलवां छत वाले मक़ानों को पीछे छोड़ती बस ब्रह्मखाल पहुंची। मुसाफ़िर अधसोए हुए से थे लेकिन साधु की नज़रें अभी भी रामप्यारी पर ही टिकी हुई थीं।

बीस मिनट रूकेगी बस... चाय-वाय पीनी हो तो पी लो’ – लगभग चीखने के से अंदाज़ में कंडक्टर ने ऐलान किया और  बस से उतरकर सड़क के किनारे बने तीन-चार ढाबों में कहीं गुम हो गया।

कुसुम, चाय पीनी है’? – रामप्यारी ने पूछा।

तुम पी आओ...सोने दो मुझे’ – घुमावदार रास्तों की वजह से कुसुम का सर चकरा रहा था। बस की खिड़की से सर टिकाकर उसने फिर से आंखें बंद कर लीं। रामप्यारी बस से उतरी और पास की पहाड़ी ढाबेनुमा दुकान पर जा पहुंची।

बस दो मिनट लगेंगे मांजी’ – रामप्यारी को देख चाय वाले ने कहा और चूल्हे में जल रही लकड़ियों को हिला-हिलाकर ज़ोर-ज़ोर से फूंक मारने लगा। रामप्यारी खड़ी चाय बनने का इंतज़ार करती रही।

रामप्यारी’ - अचानक किसी ने पुकारा। रामप्यारी मुड़ी तो ठीक पीछे वोही साधु खड़ा था।

कौन है ये? इसे मेरा नाम कैसे पता चला’? – क्षणभर में रामप्यारी के मन में बेशुमार प्रश्न कौंध पड़े।

तुम रामप्यारी हो ’? रामप्यारी को साधु की आवाज़ किसी अंधे कुएं में से आती प्रतीत हुई। साधु की आंखें अब भी उसके चेहरे पर टिकी हुई थीं। रामप्यारी के भीतर उपजी खीझ उस साधु की उदास और निष्कपट आंखों और शांत, सौम्य, निष्पाप चेहरे को देखकर कहीं ग़ुम हो गयी थी। प्रत्युत्तर में उसने सर हिलाकर हामी भरी तो साधु जड़ हो गया। मारे उत्तेजना के उसके होंठ कांपने लगे और आंखें डबडबा उठीं।
        
तुमने मुझे नहीं पहचाना प्यारो?...मैं बलराज हूं...तुम्हारा बलराज’ – साधु लगभग चीख ही पड़ा था।कहां थीं तुम इतने बरस?...कितना ढूंढा तुम्हें मैंने...लेकिन’...और वो फफक पड़ा। रामप्यारी ने अगर ख़ुद को संभाला होता तो वो गश खाकर गिर ही पड़ती। लेकिन अपनी आंखों को भीगने से वो भी नहीं रोक पायी।

कुछ क्षणों बाद बलराज संयत हुआ - ‘आओ...भीतर चलकर बैठते हैं उसने रामप्यारी का हाथ पकड़ना चाहा लेकिन रामप्यारी ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। उस एक क्षण में उसका दिल बार बार रोया लेकिन हालात उसके बस में नहीं थे। बलराज उसके भीतर उमड़ते तूफ़ान को भांप नहीं पाया था।    

वो दोनों ढाबे के भीतर रखी कुर्सियों पर जाकर बैठे तो रामप्यारी काफ़ी हद तक संभल चुकी थी। लेकिन बलराज के लिए भावनाओं के उमड़ते ज्वार को रोक पाना असंभव था। मारे उत्तेजना के वो कांप रहा था। रामप्यारी से वो सभी कुछ एक साथ जान लेना चाहता था और इस प्रयास में उसकी ज़ुबान मानों तालू से चिपककर रह गयी थी।      

कुछ क्षणों की ख़ामोशी के बाद बलराज ने चुप्पी तोड़ी – ‘उस रोज़ तुम्हें तुम्हारे मायके छोड़कर लौटा तो सभी कुछ ख़त्म हो चुका था। दंगाईयों ने पूरे मुहल्ले को जलाकर राख कर दिया था। मां-बाप, भाई-बहन सभी क़त्ल कर दिए गए थे। पूरे ख़ानदान में सिर्फ़ एक मैं ही बचा था। तुम्हारी खोज-ख़बर लेने वापस तुम्हारे मायके पहुंचा तो वहां भी सबकुछ ख़त्म था। ऐसे में मेरा भी जीने का कोई मक़सद नहीं रह गया था। लेकिन जब पास-पड़ोसियों से पता चला कि तुम्हारी हालत पर तरस खाकर दंगाईयों ने तुम्हारी जान बख़्श दी थी तो मन में जीने की लालसा एक बार फिर से जाग उठी। मैं हिंदुस्तान आया और शहर दर शहर तुम्हें खोजता रहा। तमाम कैंपों में देखा, अस्पताल छान मारे लेकिन तुम्हारा कुछ भी पता नहीं चल पाया। वक़्त गुज़रता रहा और मैं टूटता चला गया। और जब कुछ भी हासिल नहीं हुआ तो मैं थकहार कर साधु बन गया 

रामप्यारी एकटक बलराज को ताक रही थी। उसका मन भार-बार भर आता था। आंसुओं को भीतर ही भीतर जज़्ब करने की कोशिश में उसका चेहरा पत्थर की तरह सख़्त हो चला था। चायवाला मेज़ पर चाय के गिलास रख गया था।

अचानक बलराज को मानों झटका सा लगा। लगभग चीखने के से अंदाज़ में उसने पूछा – ‘हमारा बच्चा कहां है प्यारो’?

रामप्यारी ख़ामोश रही।

जवाब दो प्यारो’...बलराज बेहद उत्तेजित था।अपनी अनदेखी औलाद और तुम्हारी याद में मैं आज तक घुटता-भटकता रहा। शांति मुझे साधु बनकर भी नहीं मिली। कहां है हमारा बच्चा, बोलो प्यारो’! – उसने रामप्यारी के हाथों को अपने हाथों में ले लिया। लेकिन रामप्यारी ने अपने हाथ छुड़ा लिए। अपने आंसुओं को जज़्ब कर पाना उसके लिए नामुमक़िन हो चला था। वो सुबकती रही। बलराज उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा था। कुछ क्षणों बाद जब वो संयत हुई तो बोली, ‘हमारी बेटी बस में बैठी है

बलराज के लिए अब एक पल भी रूक पाना संभव नहीं था। वो झटके से उठा लेकिन रामप्यारी ने उसे रोक लिया – ‘सुनो !...उसे तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं पता

क्या मतलब’? – बलराज चौंका।

सच कह रही हूं। उसे मैंने तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं बताया। क्या करूं, मजबूर थी मैं रामप्यारी फफक कर रो पड़ी। बलराज के चेहरे पर सैकड़ों रंग आए-गए और वो एकटक रामप्यारी को ताकता रहा। कुछ पलों बाद ख़ुद को संभालते हुए रामप्यारी ने कहा, ‘मेरे सामने ही अम्मा-बाऊजी, भाई-बहन, पूरा परिवार काट डाला था दंगाईयों ने। लेकिन मुझे पड़ोसियों ने किसी तरह से बचाकर फ़ौज को सौंप दिया। फ़ौजियों के ट्रक से मुझे सरहद पार लाकर रिफ़्यूज़ी कैंप में पहुंचा दिया गया। तुम्हारी तलाश में मैं भी कम नहीं भटकी। जहां कहीं उम्मीद नज़र आयी, खोजती फिरी तुम्हें। और फिर जब पता चला कि तुम्हारा भी सबकुछ ख़त्म हो गया तो उम्मीद छोड़ दी। तब तक हमारी बेटी भी दुनिया में चुकी थी। मैंने उसका नाम कुसुम रखा...याद है , तुम कहते थे कि अगर बेटी होगी तो हम उसका नाम कुसुम रखेंगे’?  

लेकिन उसे तुमने मेरे बारे में कुछ नहीं बताया’? – बलराज के स्वर में पीड़ा, क्षोभ और उत्सुकता का मिला-जुला भाव था।


हां, मजबूर थी मैं। दुधमुंही बच्ची को गोद में लेकर कहां जाती। दुनिया में कोई था भी तो नहीं मेरा। सामाजिक संस्थाओं ने समझाबुझाकर मेरा दूसरा ब्याह करा दिया, हालांकि वो फ़ैसला लेते वक़्त मन बहुत रोया मेरा। लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं था मेरे पास। वो भी अपने ख़ानदान में अकेले बचे थे। कुसुम उन्हीं को अपना बाप समझती है। कुसुम से छोटे चार बच्चे और हैं मेरे। अब तो उनके भी बच्चों के शादी-ब्याह हो चुके हैं।...और कुसुम तो दादी-नानी भी बन चुकी है रामप्यारी फफक पड़ी थी। बलराज का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

तुम चलो मेरे साथ। उनसे मिल लेना। गए बरस लकवा पड़ा था उन्हें। अब बिस्तर में ही पड़े रहते हैं। वो तो सब जानते ही हैं, कुसुम को मैं धीरे-धीरे सब समझा दूंगी। बड़कोट में रह रहे हैं हम लोग

तभी बस के ड्राईवर ने हॉर्न बजाया। सवारियां बस की तरफ़ लपकने लगीं। रामप्यारी ने बलराज से कहा, ‘चलो भी !...बस चलने वाली है  लेकिन बलराज मूर्तिवत बैठा रहा। उसकी आंखों में शांति, चेहरे पर उदासी और होंठों पर फीकी मुस्कुराहट थी। ड्राईवर लगातार हॉर्न बजाए जा रहा था।

मां, कहां हो तुम?...जल्दी आओ, बस चलने वाली है’! खिड़की में से कुसुम चिल्लायी।

सोच क्या रहे हो?...चलो रामप्यारी ने बलराज का हाथ पकड़ लिया।

नहीं, तुम जाओ वो हाथ छुड़ाता बोला। तुम और कुसुम सुखी हो, मेरे लिए बस इतना ही काफ़ी है। सारी उम्र तड़पते हुए गुज़ारी, कम से कम चैन से मर तो सकूंगा

क्या कर रही हो मां?... जल्दी आओ कुसुम झल्ला पड़ी थी। 

रामप्यारी की समझ में ही नहीं आया कि वो करे तो क्या करे। उसने चाय के पैसे देने चाहे लेकिन बलराज ने उसका हाथ पकड़ लिया – ‘कम से कम ये हक़ तो मुझसे मत छीनो प्यारो। जाओ...अब देर मत करो रामप्यारी हतप्रभ थी। मजबूरन उसे बलराज को वहीं छोड़ बस में चढ़ जाना पड़ा।

इतनी देर क्यों लगा दी तुमने’? कुसुम ने शिकायती लहजे में पूछा और फिर से आंखें मूंद लीं। कंडक्टर ने सवारियां गिनीं और अचानक चीख पड़ा – ‘अरे रोक भाई, बुड्ढा नहीं आया ड्राईवर के मुंह से एक भद्दी सी गाली निकली और उसने बस रोक दी। लेकिन कंडक्टर के बुलाने पर बलराज ने हाथ हिलाकर आने से इंकार कर दिया।

चल भाई चल, बुढ़ऊ को नहीं आना’ – ड्राईवर के क़रीब जाकर कंडक्टर बस के बोनट पर बैठ गया था। रामप्यारी ने मुड़कर देखा, बलराज सड़क पर खड़ा दूर होती बस को अपलक ताक रहा था।

पागल लगता है बुढ़ऊ ...टिकट यमुनोत्री का लिया, मूड बना तो यहीं उतर गया भौंडी सी हंसी हंसते हुए कंडक्टर  ने कहा और अपने और ड्राईवर के लिए बीड़ी सुलगाने लगा। कुसुम देख ले इसलिए रामप्यारी अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करती रही लेकिन सैलाब आख़िर टूट ही पड़ा।

क्या हो गया मां’? कुसुम ने घबराकर पूछा लेकिन रामप्यारी कुछ कह नहीं पायी। रोते-रोते उसकी हिचकियां बंध गयीं। अगल-बगल के यात्री चेहरों पर प्रश्नचिन्ह लिए उसे ताकने लगे। 

...और चीड़ के घने जंगलों से घिरी पहाड़ी सड़क पर बस रेंगती हुई सी आगे बढ़ती रही।

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(जनसत्ता सबरंग / 5 जनवरी 1997 में प्रकाशित)