Monday, 9 June 2014

“अभावों से उपजे शब्द" – सुभाष पंत

मुलाक़ात   कहानीकार सुभाष पंत के साथ
अभावों से उपजे शब्द.......!!! 
(सुभाष पंत)


1970 के दशक में हिन्दी कथाकारों के बीच सुभाष पंत का नाम बहुत तेज़ी से उभरा और जल्द ही वो अग्रणी कथाकारों की पांत में खड़े हुए। मशहूर साहित्यकार औरसारिकाके संपादक कमलेश्वर जी के प्रिय सुभाष पंत समय के साथ समांतर लेखन आंदोलन का भी एक महत्वपूर्ण अंग बने। पिछले चार दशकों से अनवरत चल रही उनकी लेखनी हर बार समाज की विकृतियों-विसंगतियों और नए-नए अनछुए पहलुओं को कहानी की शक़्ल में पाठकों के सामने लाती रही है। मई 2014 के अंतिम सप्ताह में डोभालवाला, देहरादून स्थित अपने आवास परव्यंग्योपासनाके साथ हुई ख़ास मुलाक़ात के दौरान उन्होंने अपने निजी और लेखकीय जीवन पर विस्तार से बेलाग बातचीत की।             

जन्म के साथ जुड़ा विवाद

मेरा जन्म 14 फ़रवरी 1939 को देहरादून के डांडा-लखौण्ड गांव की मेरी ननिहाल में हुआ था। उस रोज़ चन्द्रमा मूल नक्षत्र के पहले चरण में था। ज्योतिष के मुताबिक़ मूल नक्षत्र के पहले चरण में जन्म लेने वाला बालकपिता का नाशकरता है इसलिए तय किया गया कि पिता को मेरा मुंह दिखाए बगैर मुझ पहली संतान को फ़ौरन किसी को गोद दे दिया जाए। लेकिन पिताजी इसके लिए तैयार नहीं हुए और मुझसे पिंड छुड़ाने की परिवार वालों की योजना धरी रह गयी। वैसे जन्म तो तुलसीदास जी का भी मूल नक्षत्र के पहले चरण में ही हुआ था लेकिन वो मुंह में एक दांत लेकर पैदा हुए थे। अफ़सोस कि मैं उस दांत से वंचित रहा।

मेरा बचपन -

मेरा बचपन घोर ग़रीबी में बीता। पिताजी सिनेमा हॉल में प्रोजेक्टर ऑपरेटर थे। नौकरी का कोई ठिकाना नहीं था। मेरे जन्म के बाद वो काफ़ी समय तक बीमार भी पड़े रहे। उधर मेरे बाद लम्बे समय तक जितने भी बच्चे हुए, कोई भी नहीं बचा। स्कूल में दाख़िले का समय आया तो पिताजी ने मुझे चुक्खू मौहल्ले के प्राईमरी स्कूल के मास्टर जी के सुपुर्द करते हुए कहा, “बच्चा हमारा, खाल आपकी, जितना जी चाहे उधेड़ो मैंने क़रीब 3 बरस उस स्कूल में गुज़ारे। लेकिन घर के माली हालात इतने खस्ताहाल थे कि दिल्ली में रहने वाली मेरी छोटी बुआ मुझे अपने साथ ले गयीं। ये साल 1947 की बात है। उनका घर दरीबाकलां में था और वो जिस कटरे (गली) में रहती थीं उसका एक दरवाज़ा चांदनी चौक में और दूसरा दरीबां में खुलता था।       
  
दिल्ली में वो एक साल -

छोटी बुआ के पास दिल्ली में मैं सिर्फ़ एक साल रहा। लेकिन उस एक साल के दौरान तीन बेहद अहम घटनाएं मेरे सामने घटीं। पहली, देश की आज़ादी...दूसरी, देश का बंटवारा...और तीसरी, गांधी की हत्या। बंटवारे के दौरान हुए दंगे-फ़साद ने मेरे बालमन पर बहुत गहरा असर डाला। मुझे आज भी दंगों की वो दहशत याद है जिसने आज़ादी की तमाम ख़ुशियों को ठण्डा करके रख दिया था, हालांकि तब मैं आज़ादी का अर्थ भी ठीक से नहीं समझता था। मुझे याद है, कटरे के दोनों तरफ़ के दरवाज़ों पर ताले जड़ दिए गए थे। ज़ेवर-नकदी थैलों में भरे गए। ईंटपत्थर इकट्ठा किए गए। छत पर जाने की इजाज़त किसी को नहीं थी। एक रोज़ मैं सबकी नज़र बचाकर छत पर पहुंच ही गया। पता नहीं वो कौन सी कुघड़ी थी कि ऊपर पहुंचते ही मैंने नीचे गली में अपनी आंखों से एक क़त्ल होते देखा। वो दर्दनाक़ नज़ारा आज भी मेरे ज़हन में ताज़ा है। वाकई वो आज़ादी बेहद दहशत भरी थी। बहरहाल एक साल बाद, 1948 के मार्च-अप्रैल में मैंने देहरादून वापस लौटकर चुक्खू मौहल्ले के उसी प्राईमरी स्कूल में पांचवी में दाख़िला ले लिया।            

अगला स्कूल  

चुक्खू मौहल्ले का स्कूल पांचवी तक ही था। छठवीं में मेरे तमाम साथी डी..वी इंटर कॉलेज में चले गए लेकिन मुझे ये कहकर तहसील के जूनियर हाईस्कूल में दाख़िला दिला दिया गया कि यहां की गणित बहुत अच्छी है। गणित का तो सिर्फ़ बहाना था, असल में उस स्कूल में फ़ीस कम थी। मुझे वहां टाट-पट्टी पर बैठना पड़ता था जबकि डी..वी के मेरे साथी कुर्सी-मेज़ पर बैठते थे और इस बात को लेकर मैं बेहद कुंठित था। स्कूल के उसनायाबमाहौल में मुझे सहपाठियों से बेहिसाब गालियां सीखने को मिलीं। ऐसी ऐसी मौलिक गालियां कि दुनिया का तमाम साहित्य एक तरफ़ और हमारी गालियां एक तरफ़, और पढ़ाई के नाम पर ठेंगा। छठवीं से आठवीं तक तीनों कक्षाओं के लिए अंग्रेज़ी के सिर्फ़ एक ही मास्टर जी थे। हम उन्हें नन्दलाल मास्टर जी के बजाय दाढ़ू मास्टर के नाम से जानते थे, जिसका श्रेय उनकी सदाबहार दाढ़ी को जाता था।

मेरी पहली रचना  

मेरी पहली रचना दु:खदर्द से सराबोर एक लेख था जो मैंने सातवीं कक्षा में लिखा था। दरअसल उस ज़माने में मास्टरों को महिनों वेतन नहीं मिलता था। इस मुद्दे पर एक रोज़ सभी स्कूलों के मास्टरों ने अपने-अपने छात्रों को साथ लेकर परेड ग्राऊण्ड में एक आमसभा की। सभा में जमकर भाषणबाज़ी हुई और तमाम दुखड़े रोए गए। गुरूजनों की इस हालत ने मुझे बुरी तरह से उद्वेलित कर दिया। मैं रात भर करवटें बदलता रहा। फिर मन का सारा गुब्बार निकालते हुए मैंने गुरूजनों के दयनीय हालात पर क़रीब तीन पन्नों का एक लेख लिखा। स्कूल में हर महिने होने वाली बालसभा में मैंनेवो लेख पढ़ा तो हेडमास्टर अमरसिंह जी ने मुझे गले लगा लिया। क़रीब छह महिने बाद वो लेख आगरा से निकलने वाली पत्रिकाशिक्षक बंधुमें छपा, तब तक मैं आठवीं में चुका था। ये पहला मौक़ा था जब शिक्षकों की पत्रिका में किसी छात्र का लेख छपा था।

......मैं हीरो बन चुका था !!!   
घर के माली हालात

घर के हालात में कोई सुधार नहीं था। पिताजी चाहते थे कि मैं भी कमाना शुरू करूं। आठवीं के बाद उन्होंने कह-सुनकर मुझे पंजाब-सिंध प्रेस मेंलैटर कम्पोज़िंगके काम पर लगा दिया। अब मैं ठहरा एक महान लेखक, भला कोई मुझे सिखाने की जुर्रत कैसे कर सकता था?...और वो भी कम्पोज़िंग जैसा काम? बस, तीसरे ही दिन मैंने काम छोड़ दिया। उधर पिताजी तांत्रिकों के चक्कर में पड़ गए थे। मैं आगे पढ़ना चाहता था इसलिए डी..वी. में नौवीं में दाख़िला लेने के साथ ही एक ट्यूशन भी पकड़ लिया। बदले में पैसे के बजाय मुझे रोज़ाना एक पाव गाय का दूध मिलने लगा जो घर के लिए वाकई ज़बर्दस्त मदद साबित हुआ। जल्द ही मेरी ट्यूशन की दुकान चल निकली और मैं अपना ख़र्च ख़ुद उठाने लगा। घर कच्चा था, जुलाई के महिने जिस रोज़ दसवीं का नतीजा आया और मैं पास हुआ, उसी रात तेज़ बारिश में घर की दीवार ढह गयी। हड़बड़ाकर उठा तो देखा पिताजी दीवार ठीक कर रहे हैं। चूंकि वो पिक्चर के आख़िरी शो के बाद घर लौटते थे इसलिए उनसे सुबह ही मुलाक़ात हो पाती थी। बहरहाल मैंने उन्हें आधी रात को घनघोर बरसात के बीच अपने पास होने की सूचना दी तो जवाब मिला, अब तू नौकरी कर ले। और जब मैंने कहा कि मैं अभी और पढ़ूंगा, तो पिताजी का जवाब था, ‘अगर तू पत्थर होता तो इस दीवार में चिनने के काम ही आ जाता      
  
अगली रचना

मां चाहती थी कि मैं पढ़ाई जारी रखूं। मैं ट्यूशन पढ़ाकर अपना ख़र्च निकालता रहा। ग्यारहवीं में मैंने एक फ़िल्म देखी जिसमें किसी का लिखा उपन्यास बहुत बिकता है। ये देखकर लगा कि मैं भी कुछ ऐसा लिखूं जिससे हमारी ज़िंदगी बदल जाए।...और मैंने छुट्टियों में एक उपन्यास लिख मारा, ‘चमकता सिताराचुभन भरा कांटा बस, अब तो ज़िंदगी बदलने ही वाली थी। लेकिन तमामपॉकेटबुक्सवालों ने उपन्यास पढ़ने की ज़हमत उठाए बग़ैर ही मुझे खेदभरे पत्र भेज दिए। नतीजतन बदली हुई ज़िंदगी के तमाम हसीन सपनों के साथ ही मेरा लेखक बनने का जोश भी धराशायी हो गया। उधर माता-पिता के बीच मेरी हालत त्रिशंकु की सी थी। मां चाहती थीं कि मैं पढ़ाई जारी रखूं और पिताजी का दबाव था कि नौकरी पकड़ लूं। इस बीच घर में बाक़ी भाई-बहन भी जन्म ले चुके थे। बहरहाल मैंने बी.एस.सी. में दाख़िला ले लिया। साथ में ट्यूशन भी करता रहा। लेकिन फ़ासले बहुत थे इसलिए कॉलेज और ट्यूशनों के बीच सामंजस्य बैठाने में मुझे नाकों चने चबाने पड़ते थे। मुझे पैदल चलना पड़ता था। साईकिल ख़रीदने की मेरी हैसियत ही नहीं थी।     

एफ़.आर.आई.
सरकारी नौकरी

उस ज़माने में ग्रेजुएशन दो साल का हुआ करता था। बी.एस.सी. के दूसरे साल में एक रोज़ कॉलेज के दोस्तों के साथ देहरादून के मशहूर एफ़.आर.आई. (फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट / वन अनुसंधान संस्थान) के बॉटैनिकल गार्डन में जाने का कार्यक्रम बना। एफ़.आर.आई. की इमारत देखी तो मैं दंग रह गया। मैंने सोचा, यहां काम करने वाले कितने ख़ुशक़िस्मत होते होंगे। अब इसे संयोग कहूं या चमत्कार, दो-तीन महिने बाद ही एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज से मुझे एफ़.आर.आई. में टेक्निकल असिस्टेंट की पोस्ट के लिए इंटरव्यू का बुलावा गया। पोस्ट एक और उम्मीदवार दस। सभी मेरे सहपाठी। सभी ने ये कहते हुए कि हमारी तो ऊंची जानपहचान है, तुझे वहां कौन जानता है, मुझे हतोत्साहित किया। ज़िंदगी में पहली बार मुझे एक ग़रीब सिनेमा ऑपरेटर का बेटा होने का अफ़सोस हुआ। टूटे मन से इण्टरव्यू के लिए गया। लेकिन बारहवीं में गणित में मेरे 87% नंबर देखकर मुझे नौकरी के लिए चुन लिया गया और बी.एस.सी. करते ही मैंने नौकरी ज्वॉइन भी कर ली। साथ ही एम.एस.सी (गणित) में भी दाख़िला ले लिया। उधर छात्रों के अभिभावकों का दबाव था, इसलिए ट्यूशन भी पढ़ाता रहा।

........मैंने क़िस्तों पर एक साईकिल भी ख़रीद ली थी।  
  
ज़िम्मेदारियां  -

लेखन से मेरा रिश्ता तो बरसों पहले जुड़ने के साथ ही टूट चुका था। नौकरी लगने के कुछ ही समय बाद साल 1964 में शादी हुई और ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ ज़िंदगी की जद्दोज़हद में भी इज़ाफ़ा होता चला गया। ख़्वाबों-ख़्यालों में खोने और कलम उठाने की अब तो तमन्ना थी और ही मेरे पास समय था। लेकिन मेरे भीतर के लेखक में शायद अभी भी थोड़ी-बहुत सांस बाक़ी थी क्योंकि लेखकों के प्रति भयमिश्रित आकर्षण से मैं पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाया था। मेरी बड़ी बुआ के बेटे सत्येन्द्र शरत तब तक एक सफल कहानीकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे और इसीलिए मैं मारे भय के उनके सामने मुंह नहीं खोल पाता था। घर-परिवार, नौकरी और ट्यूशनों में 
मैं बुरी तरह उलझा हुआ था। दिन-रात की हाड़तोड़ मेहनत का नतीजा प्लूरिसी की शक़्ल में सामने आया। मेरे फेंफड़ों में पानी भर गया था जिससे मैं लम्बे इलाज के बाद मुक्त हो पाया था। 

   
कलम का दोबारा उठना

ऑफ़िस के प्रोजेक्ट के सिलसिले में क़रीब सात-आठ साल तक मेरा लगातार अहमदाबाद जाना-आना होता रहा। ऐसे ही एक दौरे पर पालनपुर स्टेशन पर घटी एक घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया। दरअसल मैंने जैसे ही बचा हुआ खाना ट्रेन की खिड़की से बाहर फेंका, एक औरत और दो बच्चे उस पर झपट पड़े।भूखका ये दहला देने वाला नज़ारा था। अहमदाबाद पहुंचने पर भी वो तीन जोड़ी आंखें मेरा पीछा करती रहीं। मन का उद्वेलन देहरादून लौटने तक भी शांत नहीं हुआ...और तब मैंने कहानी लिखी, ‘गाय का दूध उन दिनों हिंदी की सिर्फ़ तीन ही साहित्यिकपत्रिकाएं हुआ करती थीं, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग और सारिका। अवसरों की कमी थी और स्थापित लेखकों का भी छपना आसान नहीं था। वो कहानी मैंने सारिका के पते पर भेज दी। क़रीब 5 महिने बाद सारिका के संपादक कमलेश्वर जी का स्वीकृति-पत्र मिला। कहानी उन्हें बहुत पसन्द आयी थी। स्वीकृति-पत्र की भनकमात्र से ही देहरादून के साहित्यकारों में खलबली मच गयी। फरवरी 1973 की सारिका में कहानी छपी और उस अंक की सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित हुई। सभी भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ, उस पर नाटक खेले गए और उसके रेडियोपाठ भी हुए। पत्नी के प्रेरित करने पर मैंने एम..साहित्य में दाख़िला ले लिया। मेरी शामें साहित्यकारों के बीच कटने लगीं। सल भर के भीतर सारिका में ही अगली कहानीतपती हुई ज़मीनछपी, पसंद की गयी और मैं एक स्थापित कथाकार कहलाने लगा।

उधर प्लूरिसी ने दोबारा सर उठाया और मुझे कसौली के सेनेटोरियम में भेज दिया गया, जहां मैंने चार महिने गुज़ारे।               

समांतर लेखन आंदोलन से जुड़ाव -

पत्रों के ज़रिए कमलेश्वर जी से मेरा लगातार सम्पर्क बना हुआ था। एक रोज़ उन्होंने मुझे कालीकट में होने जा रही साहित्यिक गोष्ठी में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। चेन्नई पहुंचने पर मेरी मुलाक़ात गोष्ठी के आयोजक इब्राहिम शरीफ़ के अलावा से.रा.यात्री, कामतानाथ, श्रवण कुमार, मधुकर सिंह, आशीष सिंहा और हिमांशु जोशी जैसे दिग्गज साहित्यकारों से हुई। ...और जब पहली बार कमलेश्वर जी से रूबरू हुआ तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया। कालीकट की गोष्ठी के साथ ही मैं समांतर लेखन आंदोलन का एक अभिन्न अंग बन बैठा था।

सारिका से बुलावा

सारिका के अलावा कई अन्य पत्रिकाओं में भी मेरी कहानियां छपने लगी थीं। अचानक एक रोज़ कमलेश्वर जी का बुलावा आया। वो चाहते थे कि मैं सारिका में ख़ाली पड़ा उपसंपादक का पद सम्भालूं। सारिका मुम्बई से निकलती थी और उन्होंने मेरे लिए मुम्बई में कम्पनी की ओर से फ़्लैट का भी इंतज़ाम कर लिया था। मेरी सुविधा को देखते हुए इंटरव्यू की औपचारिकता दिल्ली में निभाई गयी जिसके लिए कमलेश्वर जी ख़ासतौर से मुम्बई से दिल्ली आए थे। इंटरव्यू देकर देहरादून वापस पहुंचा तो अचानक घर की ज़िम्मेदारियों का एहसास होने लगा। माता-पिता और छोटे भाई-बहनों का ख़्याल आया तो लगा घर-परिवार और सरकारी नौकरी छोड़कर किसी दूसरे शहर चले जाना तो व्यावहारिक है और ही मेरे लिए संभव हो पाएगा। मैंने पत्र लिखकर कमलेश्वर जी से माफ़ी मांग ली। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। शायद उन्हें मेरा इंकार अच्छा नहीं लगा था। लेकिन कुछ समय बाद राजगीर में आयोजित समांतर लेखक सम्मेलन में कमलेश्वर जी से मुलाक़ात हुई तो वो अपने चिरपरिचित अंदाज़ में नज़र आए। उन्होंने मुझे नाराज़गी का ज़रा भी एहसास नहीं होने दिया।      

कमलेश्वर जी का सारिका से अलग होना

कमलेश्वर जी का अत्यंत लोकप्रिय कार्यक्रमपरिक्रमासत्तर के दशक में मुम्बई दूरदर्शन से प्रसारित होता था। विपक्ष के एक दिग्गज नेता कुछ निजी कारणों सेपरिक्रमाको लेकर कमलेश्वर जी से बेहद नाराज़ थे। आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार में सम्बन्धित विभाग का मंत्री बनते ही उन्हें कमलेश्वर जी से बदला लेने का मौक़ा मिल गया। उन्होंने टाईम्स ऑफ़ इंडिया समूह पर भी कमलेश्वर जी को सारिका से हटाने के लिए दबाव डाला। त्यागपत्र देने के टाईम्स समूह के आग्रह को कमलेश्वर जी ने यह कहकर ठुकरा दिया कि आप मुझे नौकरी से बर्खास्त कर दीजिए, मैं त्यागपत्र नहीं दूंगा। कमलेश्वर जी के क़द और तमाम हालात को देखते हुए टाईम्स समूह के लिए बर्खास्तगी जैसा क़दम उठा पाना संभव नहीं था। काफ़ी जद्दोज़हद के बाद फ़ैसला लिया गया कि सारिका को मुम्बई से दिल्ली ले आया जाए। ज़ाहिर था कि फ़िल्मों में व्यस्तता की वजह से कमलेश्वर जी मुम्बई नहीं छोड़ सकते थे। मंत्री जी की नाराज़गी ने असर दिखाया, टाईम्स की योजना कामयाब रही और कमलेश्वर जी को त्यागपत्र देना पड़ा।

.......1978 से सारिका दिल्ली से प्रकाशित होने लगी थी।

कमलेश्वर जी से क़रीबी का नतीजा -   

कमलेश्वर जी से क़रीबी की वजह से मंत्री जी के ग़ुस्से की गाज़ मुझ पर भी गिरी। मेरे ख़िलाफ़ सी.बी.आई. की जांच बैठा दी गयी। लगातार एक साल तक मुझसे पूछताछ होती रही जिसका असर मेरे लेखन की गति पर भी पड़ा। उस दौरान मैं कुछ लिख ही नहीं पाया। जांच में सी.बी.आई. के हाथ कुछ नहीं लगा तो अंतिम रिपोर्ट में लिख दिया गया, ‘लेखक सरकारी नौकर है, इसका चरित्र ठीक पाया गया लेकिन मंत्री जी संतुष्ट नहीं थे। इसके बाद भी सी.बी.आई. को दो बार मेरे पीछे लगाया गया। चूंकि सी.बी.आई. वाले हक़ीक़त से वाक़िफ़ थे, इसलिए वो महज़ रस्मअदायगी के लिए एकाध बार दोस्ताना अंदाज़ में मुझसे मिले और जैसी कि उम्मीद थी, उन दोनों क़वायदों का नतीजा भी ढाक के तीन पात ही रहा।

आज

साल 1999 में रिटायरमेंट के बाद अब मैं पूरी तरह से लेखन में व्यस्त हूं। अभी तक मेरे क़रीब आठ कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक नाटक प्रकाशित हो चुके हैं। फ़िलहाल अगले उपन्यासजबड़ापर काम कर रहा हूं। परिकथा, कथाक्रम, पहल और बया पत्रिकाओं में पिछले दिनों प्रकाशित कहानियां क्रमश: ‘अन्नाबाई का सलाम’, ‘ स्टिच इन टाईम’, ‘सिंगिंग बेलऔरचायघर में लड़कीइन दिनों ख़ासी चर्चा में हैं। इसके अलावा मुझपर दिल्ली से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिकाशब्दयोगके सम्पादन का दायित्व भी है। और हां, प्रकाशित हो चुके तीन उपन्यासों में ग्यारहवीं कक्षा में लिखा मेरा वो पहला उपन्यास भी शामिल है जिसके दम पर मैंने बदली हुई ज़िंदगी के बेशुमार हसीन ख़्वाब देखे थे और जिसके बदले में मुझे बेशुमार खेदपत्र मिले थे लखनऊ के किसी प्रकाशक ने 1960 के दशक में ही वो उपन्यास प्रकाशित कर दिया था - ‘चमकता सिताराचुभन भरा कांटा

विशेष : ‘सुभाष पंत के समग्र साहित्य का आलोचनात्मक अध्ययनविषय पर इन दिनों पिथौरागढ़ की एक शिक्षिका डॉक्ट्रेट कर रही हैं।   

(संपर्क : सुभाष पंत, 280, डोभालवाला, देहरादून, उत्तराखण्ड – 248001 / फ़ोन : 0135-2659667) 

.................................................................प्रस्तुति : शिशिर कृष्ण शर्मा