Saturday, 30 August 2014

“मन्द्र सप्तक में सरोद की झंकार" – कमल शर्मा

मुलाक़ात   विविध भारती के वरिष्ठ उद्घोषक कमल शर्मा के साथ
मन्द्र सप्तक में सरोद की झंकार.......!!! 

(कमल शर्मा)
"निरभ्र आकाश के आंगन में यूं जगमगा रहे हैं सितारे...
मानों किसी शिल्पी ने जड़ दी हों अनगिनत मणियां...
वनप्रांतर जंगली फूलों की महक से मदहोश है...
रातभर जंगल के पेड़ भीगते रहेंगे ओस में...
पीते रहेंगे ओक भरभर के चांदनी...
झूमते रहेंगे हवा की थपकियों पर...
सुनते रहेंगे नदी के उस पार जाते बूढ़े माझी का गीत..."

राजस्थान के रेतीले इलाक़ों में दूर-दूर बसी ढाणियां हों या हिमालय, अरावली, विंध्य, सतपुड़ा, सुंदरवन और दंडकारण्य में घने जंगलों के बीच बसे गांव, नगरों-महानगरों की गहमागहमी हो या देश की दुरूह और दुर्गम सीमाओं की सुनसान रातें...अकेलेपन की भयावहता से जूझ रहे हरेक शख़्स और सीमाओं की सुरक्षा के लिए तत्पर, अपनों से दूर हरेक जांबाज़ सिपाही को सहारा देती है अपनापन लिए एक आवाज़...धीर-गंभीर...उदासी के झीने आवरण में लिपटी हुई...मन्द्र सप्तक में सरोद की झंकार की तरह सीधी दिल में उतर जाने वाली - ’निरभ्र आकाश के आंगन में यूं जगमगा रहे हैं सितारे...’!

सुनने वालों पर जादू सा कर देने वाली ये जानी-पहचानी आवाज़ है कमल शर्मा की!... विविध भारती के वरिष्ठ उद्घोषक कमल शर्मा, जिन्होंने हाल ही में ‘व्यंग्योपासना’ के साथ अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर लंबी बातचीत की।

...प्रस्तुत है कमल शर्मा की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी...!!! 

मेरा जन्म -

मेरा जन्म 26 अगस्त 1957 को कपूरथला, पंजाब के चहेड़ू गांव में हुआ था। मेरे पूर्वज कश्मीर के गेंदरबल के रहने वाले कश्मीरी पंडित थे जो अपने नाम के आगे ‘गेंदर’ उपनाम का इस्तेमाल करते थे। मेरे दादा लाहौर जाकर बस गए थे। मुल्क़ का बंटवारा हुआ तो दादा परिवार को साथ लेकर चहेड़ू चले आए। मेरी मां फगवाड़ा के एक आर्यसमाजी परिवार से थीं। नाना का कोलकाता में अपना होटल था। 1942 के दंगों में होटल को आग लगा दी गयी थी जिसके बाद नाना वापस फगवाड़ा चले आए थे। मेरी नानी स्वतंत्रता सेनानी थीं।

हिंदुस्तान आने के बाद मेरे पिता को सरकार के ‘आर.आर.ओ.’ (रिक्लेमेशन एंड रीहेबिलिटेशन ऑर्गनाईज़ेशन) विभाग में नौकरी मिल गयी थी। पारिवारिक उपनाम ‘गेंदर’ की जगह ‘शर्मा’ का इस्तेमाल मेरे पिता ने शुरू किया था।

संगीतकार सरदार मलिक 
मेरा बचपन  -

मेरा बचपन उड़ीसा और महाराष्ट्र के जंगलों में बीता जहां पिताजी नौकरी पर थे। उनके विभाग का काम जंगलों को साफ़ करके बंटवारे के बाद भारत आए हुए शरणार्थियों को बसाना था घने जंगलों को काटकर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों को बसाने के काम के सिलसिले में पिताजी पत्नी-बच्चों को साथ लिए कई साल उड़ीसा के उमरकोट, कोंडागांव, फरसगांव, मलकानगिरी के जंगलों और महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले में खानाबदोशों की तरह भटकते रहे।

घर में माता-पिता के अलावा हम चार भाई-बहन थे। दोनों बहनें बड़ी थीं, तीसरे नम्बर पर मैं और मुझसे छोटा एक भाई। पिता के तमाम सहकर्मियों और उनके परिजनों समेत हम सब एक बड़े परिवार की तरह थे जिसमें पंजाबी, उड़िया, तमिल, तेलुगू, मराठी, बंगाली और सिंधियों समेत देश के कोने कोने से आए लोग शामिल थे। जंगल की असुरक्षा हमें ‘सामुहिकता में सुरक्षा’ का एहसास दिलाती था। सभी लोग जंगल के बीच किसी खुली सी जगह पर तम्बुओं में या अस्थायी घर बनाकर रहते थे और तीज-त्यौहार मिलजुलकर मनाते थे। जंगलों की वो ज़िंदगी ख़ासी रोमांचक थी। घने जंगल, हवाओं की सरसराहट, अल्हड़ पहाड़ी नदियां, हिरन के छौनों की तरह चपल-चंचल पहाड़ी झरने, बरसात में गीली लकड़ी की ख़ुशबू... मुझे आज भी ये सब बेहद अपने से लगते हैं। उधर शेर, चीते, भालू, सांप और बिच्छू जैसे ख़तरनाक़ जीव भी हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थे। दूध के लिए बकरियां पाली जाती थीं। दो बार तो शेर हम बच्चों की मौजूदगी में ही घर के अन्दर घुसकर बकरी के बच्चों को उठाकर ले गया था।

...जिस जंगल ने मेरे तमाम डर को दूर किया था, उस जंगल से दूर होते ही वो डर फिर से पैदा हो गया था...दरअसल शहर मुझे कहीं ज़्यादा डराता है!

संगीतकार जे.पी.कौशिक 
मेरी पढ़ाई –

उड़ीसा के जंगलों में दिल्ली बोर्ड की ओर से कैम्प के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल खुलवा दिया गया था। मैंने उस स्कूल से कच्ची और पहली क्लास पास की। उस दौरान मेरे नाना-नानी  फगवाड़ा से दिल्ली आ गए थे और नानाजी ने दिल्ली के राजौरी गार्डन में मकान बनवा लिया था। मैं नाना-नानी के पास दिल्ली आ गया जहां मुझे राजौरी गार्डन के स्कूल में दूसरी क्लास में दाखिला दिलाया गया। दिल्ली में मैंने दूसरी से चौथी तक तीन साल पढ़ाई की और फिर वापस मलकानगिरी लौट गया। उसी दौरान पिताजी का ट्रांसफर यवतमाल हो गया था। पांचवी और छठी की पढ़ाई मैंने यवतमाल के एंग्लो-हिंदी हाईस्कूल से की और फिर हम लोग रायपुर (अब छत्तीसगढ़) के माना कैम्प चले आए जहां बंगाली शरणार्थियों को बसाया गया था। माना गांव के स्कूल से सातवीं और माना कैम्प के बंगाली छात्रों की बहुतायत वाले स्कूल से आठवीं करने के बाद मुझे एक बार फिर से दिल्ली भेज दिया गया।

गायिका उषा उत्थुप 
दिल्ली में वो एक साल -

इस बार मैं दिल्ली में अपने ताऊजी के घर पर रहा। ताऊजी विदेश सेवा में थे और सरोजिनी नगर में रहते थे। उन्होंने मुझे नौवीं में दाख़िला दिला दिया। लेकिन अंग्रेज़ी माध्यम में मैं चल नहीं पाया। उधर पता चला मां की तबीयत ख़राब है तो मेरा मन घर वापसी के लिए तड़प उठा। पेट के अल्सर की वजह से मां को अस्पताल में भरती कराया गया था। दिल्ली में एक-एक पल गुज़ारना मेरे लिए पहाड़ हो चला था। ताऊजी के घर की छत पर बैठा मैं आसमान में उड़ते जहाज़ों को देख-देखकर सिसकता रहता था कि क्या इनमें से कोई जहाज़ मुझे मेरी मां के पास नहीं पहुंचा सकता? रातरात भर सपने में मां दिखती थीं। वो मुझे अपने पास बुलाती थीं। और फिर एक रोज़ सपने में मैंने मां की मौत देखी। दिल्ली में गुज़ारा वो एक साल मेरी ज़िंदगी का सबसे बदतर समय था। सालभर बाद वापस लौटा तो पता चला घरवाले माना कैम्प छोड़कर रायपुर शहर की गुरदत्तामल कॉलोनी में शिफ़्ट हो चुके हैं। ट्रेन के लम्बे सफ़र का थकाहारा मैं अपना सारा सामान उठाए माना कैम्प से किसी तरह वापस रायपुर लौटा। और जब घर पहुंचकर मां के गले से लिपटा तो ऐसा लगा जैसे मुझे नयी ज़िंदगी मिली हो।

....................उस वक़्त मेरी उम्र महज़ चौदह साल थी।      

अभिनेत्री मंदाकिनी
रायपुर शहर  

रायपुर शहर ने मुझे कई नए आयामों से परिचित कराया। नौवीं से ग्यारहवीं तक की स्कूली पढ़ाई मैंने माधवराव सप्रे हायर सेकण्ड्री स्कूल से पूरी की और फिर रविशंकर विश्वविद्यालय से बी.एस.सी करने के बाद लाईब्रेरी साईंस और पत्रकारिता में ग्रेजुएशन (बी.लिब. और बी.जर्न.) की डिग्रियां हासिल कीं। उस दौरान मैं रायपुर के लेखकों, कवियों और रंगकर्मियों समेत तमाम बुद्धिजीवियों के सम्पर्क में आया। इन्हीं में से एक थे जयंत देशमुख जो आज मुम्बई फ़िल्मोद्योग के जाने-माने कला-निर्देशक हैं। जयंत के ज़रिए मेरी मुलाक़ात रायपुर रेडियो स्टेशन के तत्कालीन ट्रांसमिशन कार्यकारी और ख्यातिप्राप्त हिंदी कवि लीलाधर मंडलोई से हुई जो आगे चलकर आकाशवाणी के महानिदेशक बने। रेडियो से मेरा परिचय कराने का श्रेय लीलाधर जी को ही जाता है।  

रेडियो का सफ़र  

लीलाधर मंडलोई के निर्देशन में मंटो की कहानी पर बने रेडियो नाटक ‘जेबकतरे’ से रेडियो के मेरे सफ़र की शुरूआत हुई। ये साल 1978-79 की बात है। उन्हीं दिनों रायपुर रेडियो पर कैज़ुअल आर्टिस्ट के पद के लिए ऑडिशन हुए तो मैंने भी आवेदन किया और मुझे चुन लिया गया। क़रीब तीन साल बाद साल 1983 में मुझे ‘नियमित उद्घोषक’ बना दिया गया। रायपुर रेडियो पर मेरे द्वारा प्रस्तुत साप्ताहिक कार्यक्रम ‘समययात्री’, ‘अपनी धरती अपना देश’, ‘हौंसले बुलन्द हैं’ और फ़ीचर ‘हम ठण्ड बेचते हैं’, ‘सलाम साहब’, ‘मौत बख़्शती है ज़िंदगी इन्हें’, ‘टोनही’ और ‘पहियों पर घूमती ज़िंदगी’ श्रोताओं द्वारा काफ़ी पसंद किए गए। उस दौरान मैंने कई रेडियो नाटकों का भी निर्माण और निर्देशन किया और उन नाटकों में भाग भी लिया।   

अभिनेत्री किरण खेर 
रंगमंच -

जीवन में स्थायित्व आया तो रेडियो नाटकों के साथ-साथ रंगमंच की ओर भी झुकाव होने लगा। हम कुछ साथियों ने मिलकर रायपुर में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन – ‘इप्टा’ इकाई की नींव रखी जिसके माध्यम से मुझे देवेन्द्रराज ‘अंकुर’ और विभा मिश्रा जैसे प्रख्यात रंगकर्मियों के साथ काम करने का मौक़ा मिला। ‘इप्टा’ के बैनर में प्रस्तुत हमारे नाटक ‘जादूगर जंगल’, मर्चेंट ऑफ़ वेनिस का हिंदी रूपांतर ‘वंशनगर का व्यापारी’, ‘अंधायुग’, ‘महाभोज’ और ‘भूखे नाविक’ बेहद सराहे गए। उन्हीं दिनों कविता-लेखन में भी हाथ आजमाना शुरू किया। मेरी पहली ही कविता गजानन माधव मुक्तिबोध के बेटे दिवाकर जी ने ‘देशबंधु’ में छापकर मुझे लिखते रहने के लिए प्रेरित किया। साहित्य और रंगमंच ने मुझे नयी दृष्टि दी। रायपुर दूरदर्शन के लिए मैंने मणि कौल और हबीब तनवीर के इंटरव्यू किए। रायपुर में मणि कौल की फ़िल्म ‘सतह से उठता आदमी’ और सत्यजित रे की ‘सद्गति’ की शूटिंग के दौरान दो बड़े फ़िल्मकारों की कार्यशैली को क़रीब से देखने और सिनेमा को थोड़ा-बहुत समझने का मौक़ा भी मिला।       

विविध भारती  –

रायपुर रेडियो स्टेशन के नवनियुक्त निदेशक वाय.टी.खरात का कहना था कि मुझे मुम्बई जाना चाहिए। उन्हें लगता था कि मैं बेहतर मौक़ों का हक़दार हूं जो मुझे मुम्बई शहर ही दे सकता है। उनके ज़ोर देने पर मैंने मुम्बई के लिए ट्रांसफ़र मांगा और मेरे आवेदन को स्वीकार करते हुए साल 1992 में मुझे मुम्बई, विविध भारती सेवा में भेज दिया गया। तब से मुम्बई ही मेरी कर्मस्थली है।

गायक दलेर मेहंदी
विविध भारती में मुझे जयराज, शमशाद बेगम, बी.आर.चोपड़ा, प्रेम धवन, जे.पी.कौशिक, ओ.पी.नैयर, माला सिंहा, वहीदा रहमान, नंदा, आनंद जी और प्यारेलाल समेत फ़िल्मोद्योग से जुड़े कई फ़नकारों के इंटरव्यू करने का मौक़ा मिला। कारगिल युद्ध के दौरान जवानों के लिए हमने ‘हलो जयमाला विशेष’ कार्यक्रम शुरू किया जिसे मैं प्रस्तुत करता था। इस कार्यक्रम से अपने जुड़ाव के सुबूत के तौर पर कारगिल में लड़ रहे जवान खंदक में बंदूक के साथ रखे ट्रांज़िस्टर की पेंसिल से बनाई गयी तस्वीरें हमें भेजते थे। युद्ध के दौरान जवानों के लिए विशेष मोबाईल ट्रांसमिटर लगाए गए थे जिनके ज़रिए जवानों से उनके परिजनों की लाईव बातचीत कराई जाती थी। युद्ध समाप्त हुआ तो हमने ‘जयमाला संदेश’ नाम से एक अन्य विशेष कार्यक्रम शुरू किया जिसमें सीमा पर तैनात जवानों के नाम उनके परिजनों के पत्र पढ़े जाते थे। इस कार्यक्रम में ख़ासतौर से बच्चों के पत्र पढ़ते वक़्त मेरा गला अक्सर रूंध जाता था क्योंकि उन पत्रों में लिखा होता था, “पापा, हमें कुछ नहीं चाहिए, बस आप घर आ जाना”।

साल 1996 में हमने भारत में रेडियो का पहला ‘इंटरैक्टिव कार्यक्रम’ ‘हलो फरमाईश’ शुरू किया जिसमें श्रोताओं से रेडियो पर सीधी बातचीत की जाती थी। ये कार्यक्रम बहुत जल्द लोकप्रियता की बुलंदियों पर पहुंच गया। इसका सुबूत था, हांगकांग की एक महिला डॉली वाधवानी द्वारा हमें लिखा गया पत्र। उस ज़माने में ‘ऑनलाईन’ इंटरनेट प्रसारण नहीं था। डॉली की एक मित्र मुम्बई में ‘हलो फरमाईश’ कार्यक्रम को रेकॉर्ड करके उसकी कैसेट डॉली को भेजती थीं। डॉली उस कैसेट को लंदन में रहने वाली अपनी एक मित्र को भेज देती थीं जो कैंसर से जूझ रही थीं। ‘हलो फ़रमाईश’ कार्यक्रम सुनकर उन बीमार महिला के मन को बेहद ख़ुशी मिलती थी। ‘हलो फ़रमाईश’ आज भी ‘विविध भारती’ के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रमों में से है। 

कमल शर्मा जी द्वारा प्रस्तुत "छायागीत" : 


एक रोज़ विविध भारती में एक महिला का फ़ोन आया जो मुझसे बात करना चाहती थीं। फ़ोन मेरे सहकर्मी अशोक सोनावणे ने उठाया। अशोक सोनावणे ने उन महिला से मेरी बात कराई। बेहद भावुक शब्दों में उन महिला ने मुझे धन्यवाद देते हुए बताया कि किस तरह कार्यक्रम ‘त्रिवेणी’ की जीवन की सकारात्मकता पर प्रसारित कड़ी ने उनमें जिजीविषा जगाई वरना वो जीवन से इतनी निराश हो चुकी थीं कि आत्महत्या के सिवा उन्हें कोई रास्ता ही नज़र नहीं आ रहा था। उस रोज़ मुझे वास्तव में रेडियो की असीम ताक़त का एहसास हुआ।

(प्रस्तोता उवाच : विविध भारती के ‘जिज्ञासा’, ‘विज्ञान पत्रिका’ और ‘पिटारा’ जैसे कार्यक्रमों के अनुसंधान और लेखन के सिलसिले में अक्सर कमल शर्मा जी से मेरी मुलाक़ात होती रहती थी। हमारी घनिष्ठता तब और बढ़ी जब विविध भारती के स्वर्णजयंती वर्ष 2007-08 में मुझे 3 घण्टे का विशेष कार्यक्रम ‘’सिनेयात्रा की गवाह : विविध भारती” लिखने का मौक़ा मिला। इस कार्यक्रम के अनुसंधान के सिलसिले में मैंने विविध भारती के संग्रहालय में मौजूद दशकों पुराने स्पूलटेपों और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्डों के ‘ख़ज़ाने’ को खंगालने में क़रीब 10 दिन बिताए थे। इस अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानजनक कार्यक्रम को कमल शर्मा जी ने स्वर दिया था।
                                 .....शिशिर कृष्ण शर्मा)

‘’सिनेयात्रा की गवाह : विविध भारती” :


आज -

आज मैं शिद्दत से महसूस करता हूं कि तमाम परेशानियों और अभावों में घने जंगलों के बीच पलने-बढ़ने के बावजूद अगर साहित्य और संस्कृति की ओर मेरा झुकाव हुआ तो उसका पूरा श्रेय मेरी मां श्रीमती पुष्पा शर्मा को जाता है, जो एक विदुषी महिला थीं। ‘दैनिक वीर अर्जुन’ में धर्म, आध्यात्म, राजनीति और महिलाओं की समस्याओं आदि विभिन्न विषयों पर नियमित रूप से उनके लेख छपते थे। इन्हीं विषयों पर उनकी टिप्पणियां बी.बी.सी. रेडियो की हिन्दी सेवा का भी महत्वपूर्ण अंग बन चुकी थीं। ‘पुष्पा बहन लिखती हैं...’ - ये उस ज़माने में बी.बी.सी. के प्रसारण की एक जानी-पहचानी पंक्ति हुआ करती थी। घने जंगलों के बीच परिवार की तमाम ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाते हुए भी मां ने अपनी रचनाधर्मिता के साथ कोई समझौता नहीं किया। मां अब इस दुनिया में नहीं हैं। पिता श्री सत्यपाल शर्मा भी अब नहीं रहे। दोनों बहनें और छोटा भाई रायपुर में हैं और मैं यहां मुम्बई में। मेरी पत्नी भावना शर्मा हिंदी की जानी-मानी पत्रकार हैं और बेटी गरिमा शर्मा अंग्रेज़ी की लेखिका और कवियित्री। यूट्यूब के ‘वीडियो डैडी’ चैनल की सह-संस्थापिका होने के साथ ही गरिमा ‘लाईफ़ स्टाईल’ और ‘कला’ पर अपने लेखन के लिए जानी जाती हैं।

अपने पिता के विभाग 'आर.आर.ओ.' को मैं भारत के इतिहास का सबसे बेरहम और स्वार्थी सरकारी विभाग मानता हूं जिसने लाखों हरे-भरे पेड़ों का क़त्ल करके प्रकृति और पर्यावरण को बेइंतहा हानि पहुंचायी और जंगल के निर्दोष, बेबस और मूक प्राणियों को बेघर किया। उस जमाने में तो मुझमें इतनी समझ नहीं थी लेकिन आज मैं जब भी तबाही के उस मंज़र को याद करता हूं तो क्रोध और बेबसी के मिलेजुले भावों को ख़ुद पर हावी होने से रोक नहीं पाता।
............................................................प्रस्तुति : शिशिर कृष्ण शर्मा  

5 comments:

  1. कमल जी को इतने करीब से परिचित करवाकर आपने
    मेरी आत्मा को प्रसन्न कर दिया शर्मा जी - ह्रदय से धन्यवाद

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  2. मैं उस दौर में भिलाई से चालीस किलोमीटर दूर शाम को युववाणी कार्यक्रम के दौरान उनसे मिलने रायपुर जाता था , वापस घर आते आते रात हो जातीी थी फिर जूतियाया जाता था रेडियो के जूनून के लिऐ , खैर उस इकहरे बदन के कमल कीी बात ही निराली थी , पुनिता हंसपाल के साथ मजेदार युववाणी की प्रस्‍तुती होती थी , खैर नमस्‍ते कहियेगा,

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  3. मैं वर्तमान में आकाशवाणी रायपुर में कैज़ुअल एनाउंसर हूँ , जब मैंने आकाशवाणी रायपुर ज्वाइन किया तब तक कमल भैया विविध भारती मुम्बई जा चुके थे लेकिन यहाँ आकाशवाणी रायपुर में उनके साथ काम कर चुके लोग जब उनके दिलचस्प क़िस्से सुनाते थे तो मेरे मन में उनको और जानने की इच्छा होती थी , साल 2014 में मैं जब मुम्बई गयी तो विविध भारती भी गयी वहाँ मेरी मुलाकात हुई कमल भैया से और ढेर सारी बातें हुई , वही युनुस भाई , अमरकांत जी , ममता जी और मनीषा दीदी से भी यादगार मुलाकात हुई थी , बहरहाल कमल भैया के बारे विस्तार से पढ़कर उन्हें और जाना , इसके लिए श्री शर्मा जी आपको ह्रदय से धन्यवाद ...

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  4. Apni taqdeer pe rashk hota hai jab sochta hun ki kamal ke sath ek lambi avadhi tak sahkarmi ke rup men karyarat raha,hum taa-oomr dost rahenge ye bhi ek sachchai hai,kamal na kewal ek achchha broadcaster hai balki ek sanvedansheel chintak bhi hai,woh jitna bada kalakar hai utna hi bada insaan hai! uske vyatitva ke itne ayaam hain, jinhe ginana mushkil hai! woh ek sarjak hai, woh achchha nirdeshak hai,jini gahri uski script hoti hai utni hi gahri uski samaz hai,kewal likhne bhar ke liye woh kabhi nahin likhta hai use woh jeeta hai, kamal, kewal insan matr nahin hai woh hai ek rishitulya manishi! uska shwanprem jagzaheer hai woh samast prakriti ka premi hai,annyay ke khilaf uski awaaz buland ho jati hai! aadmi jitna crystal clear hota hai uski awaaz men wo baat aa jati hai, ye mana hua satya hai! kamal ki awaaz uske vyaktitva ki sahi pahchan hai! is baat ki tayeed, ghangambheer awaaz ke merumani shri brijbhushan(bade)ji ne bhi ki hai! kamal,mera pyara dost, muze faqr hai is buland shakhsiyat ke sath kam karne ka! kitni hi barikiyan usne jane anjane muze sikhayi hain..kitni hi baar studiyo ke ekant men hum donon kisi baat ko lekar aankhen nam karchuke hain! main shukrguzar hun niyanta ka ki chahe dukh usne diye hon par kamal jaisa saksham kandha bhi diya hai, kahte hain aadmi bhavook ho jaye to kaam ka nahin rahta, par kya karun, uski baaten padhi to raha nahin gaya, vaise f/b ki is vidha se kam parichit hun, ek baar likha hua delete bhi ho gaya tha baad men bete ki mada se ukt baaten likh saka hun,sahma hua bhi hun ki kamal padhega to emotional ho jayega par majburi hai...main bhale hi zameen ka zarra hun,himalay sa buland kamal, mera dost hai! shishir krishna sharmaji ko antsth se dhanyawad!

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  5. मैने कमल जी कोअशोक जी या शर्मा भैया इतना नजदीक से इतना लंबा समय तो नहीं बीतया पर जो भी क्षण साथ साथ बिताये, व्ह बहुत अनमोल थे। इंसाँन की पहचान दिलाने के लिये काफी है, मेरे जैसे को, जो दिन मे 100-150 पब्लिक से डील करता हो, और पब्लिक का चेहरा पंढणे का आदी हो।
    एक घटना..बिहार से कोई श्रोता कमलजी के बारे मे लिख कर बता रहा था की व्ह अभि भारत सरकार के AG ऑफिस मे पटना मे कार्यरत है, रेडियो बचपन से सूनते है, खास कर कमल जी का हर कार्यक्रम। कमल जी को मिल्ने या बात करणे की तमन्ना लिये जी रहा है, हर रोज याद करकर। मैने पहल की और कमल जी से बात करवाई। व्ह श्रोता इतना खुश था की बोल रहा था की जीवन का मकसद सफल हो गया,भगवान से साक्षात बात हो गयी, अब कोई इच्छा बची नही, आज मर भी जाऊ तो कोई गिला शिकवा नही। ऐसे और भी की दीवणे है, कमल जी को भगवान मान ने वाले।
    कमल भैया .. आज आप बहुत याद आ रहे.. जलदी आईए.. यवतमाल का अँग्लो हिंदी हायस्कुल इंटजार कर रहा है... आईए जलदी।।।

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