Friday, 27 February 2015

“मण्टो का बम्बई”

मण्टो का बम्बई

धर्मेन्द्रनाथ ओझा द्वारा निर्मित वृत्तचित्र !!!

(मूलत: 2 अप्रैल 2005 के साप्ताहिक सहारा समय’ में प्रकाशित)

मण्टो : 11 मई 1912 - 18 जनवरी 1955
सआदत हसन मण्टो ! उर्दू साहित्य की वो शख़्सियत जिनकी तुलना चेखव और मोपांसा से की जाती है। लेकिन समाज को और अपने सम्पर्क में आने वाले हरेक शख़्स को बिल्कुल अलग नज़रिए से देखने और काग़ज़ पर उसका बेबाक ख़ाका खींचने की उनकी फ़ितरत ने अगर लाखों पाठकों को उनका दीवाना बनाया तो दुश्मनों की फ़ौज खड़ी करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। मुम्बई से मण्टो को बेहद प्यार था। वो मुम्बई जो उस ज़माने में बम्बई कहलाती थी। जनवरी सन 1948 में पाकिस्तान जाने से पहले के बारह बरस मण्टो ने इसी मुम्बई में गुज़ारे थे। और उन बारह बरसों में मण्टो ने तमाम रंगीनियों से लबरेज़ और सपने जगाने वाली जगमगाती मुम्बई की जगह उन गली-कूंचों की ख़ाक छानी थी, जहां क़दम रखने से पहले कोई भी शरीफ़ इंसान एकबारगी हिचकिचाएगा ज़रूर। 

दिन के उजाले हों या रात के अंधेरे, इन्हीं जगहों पर मण्टो अपनी कहानी के किरदारों को तलाशते फिरते थे। कहानी मम्मदभाई’ और रामखेलावनके नायक हों या सिराजका ढोंढू, ‘मोजेलकी नायिका हो, या फिर हतककी सौगंधी, मण्टो को ये सभी लोग गन्दगी से बजबजाती नालियों और कूड़े-करकट के ढेर से अटे इन्हीं गली-कूंचों में मिले थे। मण्टो कहते थे, “मैं चलता फिरता बम्बई हूं शायद इसलिए, कि मुम्बई का असली चेहरा देखा था उन्होंने। तमाम आलोचनाओं और अपने ख़िलाफ़ दायर मुक़द्दमों की तरफ़ से बेपरवाह मण्टो ये कहना नहीं भूलते थे कि, “मैं सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा, सोसायटी तो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि ये मेरा काम नहीं है मुम्बई में मण्टो के गुज़ारे उन बारह बरसों में एक बार फिर से झांकने की कोशिश की है युवा लेखक-निर्देशक धर्मेन्द्रनाथ ओझा ने, जिनके द्वारा बनाया गया वृत्तचित्र मण्टो का बम्बईइन दिनों ख़ासी चर्चा में है।

धर्मेन्द्र कहते हैं, “अतीत मुझे हमेशा से लुभाता आया है। मण्टो की कहानियों से ही मुझे पता चला कि कभी मुम्बई में भी ट्रामें चला करती थीं। उनकी कहानियों में वर्णित पुरानी मुम्बई के अरब गली, नागपाड़ा, कमाठीपुरा, मोहम्मदअली रोड, बिस्मिल्लाह होटल, प्लेहाऊस के पास अल्फ़्रेडसमेत कतार से बने सिनेमाघरों जैसी जगहों को और उस वक़्त को मैं ख़ुद जीना चाहता था। मैं शिद्दत से महसूस करता था, अगर ये सब एक बार फिर से जीवंत हो उठे तो...? और इस तोने ही मुझे ये वृत्तचित्र बनाने के लिए प्रेरित किया

लगभग 22 मिनट के इस वृत्तचित्र को, जिसे डॉक्यूड्रामा कहना ज़्यादा उचित होगा, अतीत के ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब जाने के मक़सद से ब्लैक एण्ड व्हाईट में और मण्टो की कहानियों में वर्णित समय और जगहों पर फ़िल्माया गया है। बीती 18 जनवरी को मण्टो को दुनिया से कूच किए हुए भले ही पचास बरस गुज़र चुके हों, लेकिन इस वृत्तचित्र में वो सांकेतिक तौर पर हर जगह मौजूद हैं। सांकेतिक इसलिए क्योंकि उनका चेहरा कहीं भी दर्शकों के सामने नहीं आता। सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, गली-कूंचों में चलते-फिरते मंटो, वेश्या के कोठे पर खड़े मण्टो, आधी रात को शराब की दुकान खुलवाते मंटो, बिस्मिल्लाह होटल में खाना खाते मण्टो, ईरानी होटल में रेडियोग्राम पर अपना पसंदीदा गीत सुनते मण्टो, सीलनभरे कमरे में बीमार पड़े मण्टो, सिनेमाहॉल के बाहर खड़े मण्टो, हिंदुस्तान छोड़कर जाते मण्टो, याने कि इस वृत्तचित्र में मण्टो हर जगह मौजूद हैं। और उनके साथ मौजूद हैं, मम्मदभाई, रामखिलावन, ढोंढू, सिराज, सौगंधी, मोजेल, सहाय, खुशिया और और भी बहुत से किरदार, जिन्हें रंगमंच से जुड़े कलाकारों से लेकर इन इलाक़ों के फ़ुटपाथों पर रह रहे लोगों तक ने निभाया है।

धर्मेन्द्र के अनुसार, “इस वृत्तचित्र के निर्माण के दौरान मुश्किलें भी कम पेश नहीं आईं। सबसे बड़ी मुश्किल तो पैसे को लेकर थी। कुल अनुमानित बजट का एक तिहाई भी मेरे पास नहीं था। ऐसे में दोस्त और शुभचिंतक मदद के लिए आगे आए और सभी ने बिना एक भी पैसा पारिश्रमिक लिए वृत्तचित्र में काम किया। यहां तक कि उन्होंने अपने आने-जाने और खाने के व्यय तक से मुझे मुक्त रखा। दूसरी बड़ी मुश्किल थी मण्टो के मुम्बई प्रवास की अवधि (1936 से 1947) के दौरान बजने वाले हिट गीतों और उस ज़माने में इस्तेमाल किए जाने वाले साज़ो-सामान की व्यवस्था की, लेकिन शुभचिंतकों के सहयोग से ये समस्या भी सुलझ गयी। ख़ासतौर से मैं उन पारसी बुज़ुर्ग का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगा जो उस ज़माने से सहेजकर रखी अपनी कार लेकर ख़ुद लोकेशन पर पहुंचे थे

मण्टो की कहानी मम्मदभाईमें वर्णित सफ़ेद गली का पता लगाने में भी धर्मेन्द्र को बहुत मुश्किल हुई क्योंकि ये नाम उस इलाक़े में रह रहे लोगों के लिए अनजाना था। कई दिनों की जद्दोज़हद के बाद वहां रहने वाले एक बुज़ुर्ग शख़्स से पता चला कि उस ज़माने में सफ़ेद गली, रेडलाईट एरिया की गलियों को कहा जाता था। धर्मेन्द्र के मन में इस बात की कसक है कि उन्हें क्लेयर रोड स्थित एडेल्फ़ी चेम्बर नाम की इमारत के उस कमरा नम्बर 17 में शूटिंग की इजाज़त नहीं मिली जिसमें कभी उर्दू पत्रिका मुसव्विरका कार्यालय था और जिसके उपसम्पादक बनकर साल 1936 में मण्टो मुम्बई आए थे।

धर्मेन्द्रनाथ ओझा की ये फ़िल्म मण्टो का बम्बईप्रबुद्धवर्ग द्वारा काफ़ी सराही जा रही है और अब वो इसे पाकिस्तान और तेहरान में होने जा रहे फ़िल्म समारोहों में भेजने की तैयारी में हैं।                                     
                                      ......प्रस्तुति : शिशिर कृष्ण शर्मा
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मण्टो का बम्बईका प्रदर्शन

फ़िल्म्स डिविज़नद्वारा आयोजित मुम्बई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह’ (फरवरी-2006)

कोलकाता फ़िल्म समारोह’ (अक्टूबर-2006)

तिरूअनंतपुरम में आयोजित केरल अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह’ (मार्च-अप्रैल 2007)

पेरिस स्थित फ़्रेंच आर्ट सोसायटीद्वारा साल 2008 में सबटाईटल्स के साथ प्रदर्शन।

पेरिस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग द्वारा विषय मण्टोके साथ मण्टो का बम्बईशामिल की गयी।

पाकिस्तान सरकार द्वारा आयोजित समारोह में मण्टो का बम्बईको नज़रअंदाज़ कर दिए जाने के बाद प्रबुद्धजन की सलाह पर तेहरान फ़िल्म समारोहसमेत किसी भी इस्लामी मुल्क़ में आयोजित होने वाले फिल्म समारोहों में इस वृत्तचित्र को नहीं भेजा गया। वजह : मण्टो और इस्मत चुगताई की बेबाक़ लेखनी को लेकर इन मुल्क़ों की सरकारों की नाराज़गी।            
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 परिचय

धर्मेन्द्रनाथ ओझा

जन्म : 13 दिसम्बर 1976, सासाराम (बिहार)

10वीं तक की पढ़ाई सासाराम से, तदोपरांत दिल्ली आकर 11वीं और 12वीं दिल्ली सरकार के हायर सेकण्डरी स्कूल से। दिल्ली के हंसराज कॉलेज से बी..(ऑनर्स), एम.. की पढ़ाई अधूरी छोड़कर 1999 में मुम्बई चले आए।

अनुराग कश्यप के साथ सहायक निर्देशक के तौर पर टी.वी.शो स्टार बेस्टसैलरसे करियर की शुरूआत। अतनु बिस्वास, भाग्यश्री और अभिनव कश्यप  द्वारा निर्देशित विभिन्न टी.वी.कार्यक्रमों से बतौर सहायक निर्देशक जुड़े रहने के बाद अब स्वतंत्र लेखन

टी.वी.धारावाहिकों हर मोड़ पर’, ‘प्रतिमा’, ‘घर आजा परदेसी’, ‘आज फिर जीने की तमन्ना हैऔर अफ़सर बिटियाका लेखन।   
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