Wednesday, 31 December 2014

“दम तोड़ती परम्परा के साधक" – अजीत सिंह

दम तोड़ती परम्परा के साधक" – अजीत सिंह

मुलाक़ात –  विचित्रवीणा वादक अजीत सिंह के साथ

दम तोड़ती परम्परा के साधक.......!!!

                              (अजीत सिंह)

“......चित्रवीणा और सरस्वतीवीणा का प्रचलन मुख्यत: दक्षिण भारत और कर्नाटक संगीत में है तो विचित्रवीणा और रूद्रवीणा उत्तर भारत में बजाई जाती हैं। चित्रवीणा को गोटुवाद्यमभी कहा जाता है। चित्रवीणा और विचित्रवीणा में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है। इन दोनों ही वीणाओं में परदे नहीं होते और इन्हें ज़मीन पर रखकर बजाया जाता है। इनके वादन में दाएं हाथ की दो अंगुलियों, तर्जनी और मध्यमा में पहने मिज़राब और बाएं हाथ से गोटुका प्रयोग होता है। गोटुअर्थात पेपरवेट के आकार का अमूमन आबनूस की लकड़ी का एक भारी और गोल टुकड़ा

........ विचित्रवीणा वादक अजीत सिंह - व्यंग्योपासनाके साथ बातचीत में...!!!


मेरा जन्म और परिवार -

मेरे दादा प्रतापसिंह मुगलानी अपने ज़माने के मशहूर तबला वादक थे जो अफ़गानिस्तान में बादशाह के बच्चों को संगीत सिखाते थे। मूल रूप से हम लोग लायलपुर के रहने वाले हैं, लेकिन हिंदुस्तान वापस आकर मेरे दादाजी ने साल 1883 में लाहौर के अनारकली बाज़ार में प्रतापसिंह का रागघरके नाम से संगीतवाद्यों की दुकान खोल ली थी। तबले के अलावा वो पखावज भी बख़ूबी बजाते थे और मराठी शास्त्रीय गायक भास्कर राव के साथ उनकी जोड़ी ख़ूब जमती थी। दादाजी अमृतसर के नामी संगीतज्ञ भाई हरनाम सिंह के शिष्य थे।

मेरे पिता गुरूदयाल सिंह जी आगाहश्र कश्मीरी के पारसी नाटकों में हारमोनियम बजाते थे। साईलेंट फ़िल्में बननी शुरू हुईं तो उस जमाने के चलन के अनुसार वो फ़िल्मों के शोज़ के दौरान परदे के सामने बैठकर भी हारमोनियम बजाने लगे। उधर वो आज़ादी की लड़ाई में भी कूद पड़े। 1912 में दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग पर बम का हमला हुआ तो उसी क्रांतिकारी दल से जुड़ा होने के नाते पिताजी भी पकड़े गए और उन्हें 5 साल की जेल हो गयी। रिहा होकर आए तो कुछ ही दिनों बाद मेरे दादाजी गुज़र गए जिसकी वजह से दुकान सम्भालने की ज़िम्मेदारी पिताजी पर गयी।

मेरा जन्म 22 फ़रवरी 1933 को लाहौर में हुआ था। स्कूली पढ़ाई लाहौर के एस.बी.एस.खालसा स्कूल में हुई जहां से मैंने 9वीं पास की, लेकिन बंटवारे की वजह से हमें लाहौर छोड़कर मसूरी चले आना पड़ा।

मसूरी से हमारा रिश्ता

पिता श्री गुरूदयाल सिंह जी
वाद्यों की ख़रीदारी के लिए पिताजी को हर साल लाहौर से कोलकाता जाना पड़ता था। हमारा तमाम लेनदेन कोलकाता की एक इंग्लिश कम्पनी टी..बैवेनसे होता था, जिसकी एक शाखा मसूरी के लाईब्रेरी स्थित माल व्यू हाऊसमें भी थी। कोलकाता और मसूरी की शाखाओं को पॉल बैवेन सम्भालते थे। बैवेन परिवार का संगीतवाद्यों का कारोबार भारतभर में फैला हुआ था। लाहौर और मुम्बई में उनकी शाखाएं जे.डी.बैवेनके नाम से थीं जिनकी देखरेख पॉल के भाई के ज़िम्मे थी। जे.डी.बैवेनमें सिर्फ़ पाश्चात्य संगीत के वाद्य बिकते थे।

1939 में दूसरे विश्वयुद्ध के शुरू होते ही जर्मनी को तेज़ी से आगे बढ़ता देख अंग्रेज़ घबरा गए थे। ऐसे में इंग्लैंड के वैल्श के रहने वाले बैवेन परिवार ने भी भारत में अपना कारोबार समेटकर वापस लौट जाने का फैसला कर लिया। पॉल ने इस बात की जानकारी मेरे पिता को दी तो उनके प्रस्ताव पर पिताजी ने साल 1939 में टी..बैवेनकी मसूरी की दुकान खरीद ली। नतीजतन पिताजी का समय लाहौर और मसूरी के बीच गुज़रने लगा।

कुछ समय बाद मसूरी का कारोबार नसीरूद्दीन जी ने सम्भाल लिया। नसीरूद्दीन जी आज़ाद हिंद फ़ौज में हेड क्लर्क थे जिसकी वजह से उन्हें अंग्रेज़ी सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया था। वो एक बेहद ही नेक और शरीफ़ शख़्स थे। जब वो सज़ा काटकर बाहर आए तो पिताजी ने मसूरी की दुकान की देखरेख का काम उन्हें सौंप दिया जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया।

हमारा मसूरी आगमन -

 विचित्रवीणा
बंटवारे के बाद साल 1947 में हम मसूरी चले आए। उधर नसीरूद्दीन जी को भारत छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा। पिताजी ने लाहौर की दुकान नसीरूद्दीन जी के नाम कर दी थी लेकिन तमाम गुज़ारिशों के बावजूद वो दुकान बजाय नसीरूद्दीन जी को सौंपने के, उसे विस्थापित-सम्पत्तिका दर्जा देकर पाकिस्तान सरकार ने अपने कब्ज़े में ले लिया। उधर मुझे मसूरी के झड़ीपानी रोड पर स्थित ऐलेन मेमोरियल स्कूल में 10वीं में दाख़िला दिला दिया गया। 10वीं पास करने में मुझे दो साल लगे। घनानन्द इंटर कॉलेज से मैंने 12वीं पास की।

देहरादून में हमारी शाखा 

मसूरी में हमारे ज़्यादातर ग्राहक अंग्रेज़ थे। बंटवारे के बाद वो इंग्लैंड वापस लौट गए। इसका हमारे कारोबार पर बुरा असर पड़ा। यही हाल देहरादून के मशहूर राजपुर रोड के पॉश एस्लेहॉल में पाश्चात्य संगीतवाद्यों की दुकान जे.डीसिल्वा एंड कम्पनीका भी हुआ। दुकान के मालिक मिस्टर डीसिल्वा गोवा के रहने वाले थे। उन्होंने देहरादून छोड़कर गोवा लौट जाने का फैसला कर लिया। पिताजी ने उनसे जे.डीसिल्वा एंड कम्पनीख़रीदी और उसका नाम बदलकर प्रताप म्यूज़िक हाऊसरख दिया। मिस्टर डीसिल्वा का घर ऐस्लेहॉल की ही पहली मंज़िल पर था। पिताजी ने दुकान के साथ ही उनसे वो घर भी ख़रीद लिया। ये भी साल 1947 का ही वाकया है।

संगीत की तरफ़ रूझान -

संगीत मुझे विरासत में मिला था। हमारे घर का माहौल ही संगीतमय था। संगीत की बुनियादी तालीम मुझे पिताजी से मिली थी। उधर वीणा के प्रति मेरे मन में उत्सुकता मोहम्मद शरीफ़ को देखकर जागी थी जो लाहौर में मेरे पिताजी के एक दोस्त के बेटे थे। मोहम्मद शरीफ़ एक बेहतरीन विचित्रवीणा वादक थे, लेकिन बाद में वो  सितार बजाने लगे थे।

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने उस जमाने के मशहूर रूद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली को पत्र लिखकर उनसे वीणा सीखने की इच्छा जताई। मूल रूप से इंदौर के रहने वाले उस्ताद असद अली दिल्ली में रहते थे। जल्द ही उनका जवाब भी मुझे मिल गया, जिसमें उन्होंने लिखा था, “सरदार होकर वीणा?...कैसे”? साथ ही उन्होंने मुझसे दिल्ली आकर मिलने को भी कहा था। मैं उनसे मिला। उन्होंने मेरा इंटरव्यू लिया, मुझे भलीभांति जांचा-परखा और कहा, ‘संगीत पूरा समर्पण मांगता है, मुझे डर है कहीं तुम बीच ही में छोड़कर भाग जाओ मैंने अपनी तरफ़ से उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त करने की कोशिश की और जल्द ही वापस आने का वादा करके मसूरी लौट आया। लेकिन उस्ताद असद अली की शागिर्दी में वीणा सीखने का मेरा सपना, सपना ही बनकर रह गया।

......पिताजी ने अपनी बीमारी का हवाला देते हुए मुझपर कारोबार की ज़िम्मेदारी डाल दी...और उस्ताद असद अली के पास दोबारा जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। 
    
विचित्रवीणा वादन की शुरूआत

साल 1954-55 में हमारी दुकान में एक विचित्रवीणा मरम्मत के लिए आयी। वीणाओं के प्रति मन में शुरू से आकर्षण तो था ही, संगीत की भी मुझे ख़ासी समझ थी सो मैंने उस वीणा पर हाथ आज़माना शुरू किया। जल्द ही विचित्रवीणा पर मेरी मज़बूत पकड़ बन गयी और फिर कुछ ही समय बाद मैंने प्रयाग संगीत समितिसे प्रभाकर भी कर लिया। मैं कह सकता हूं कि विचित्रवीणामैंने अपने आप ही सीखी। 

साल 1957 में मेरी मुलाक़ात मशहूर सितारवादक उस्ताद विलायत ख़ां से हुई जो एक साल के लिए मसूरी में रहने आए थे। उनसे मुझे संगीत के विषय में बहुत कुछ सीखने को मिला। वो मुझे वादन की बारीकियां सिखाते थे, मेरी गलतियां सुधरवाते थे, उनके मसूरी से जाने के बाद भी मैंने उनसे सम्पर्क बनाए रखा।

1965 में पिताजी का देहांत हुआ तो मेरी व्यस्तताएं बेतहाशा बढ़ गयीं। लेकिन दो जगह का काम मुझसे सम्भल नहीं पाया इसलिए साल 1967 में मसूरी का काम बन्द करके मैं स्थायी रूप से देहरादून आकर प्रताप म्यूज़िक हाऊससम्भालने लगा। उधर उस्ताद विलायत ख़ां भी साल 1972 में देहरादून आकर बस गए थे, इसलिए उनके सान्निध्य में भी मेरा काफ़ी समय गुज़रने लगा।

संगीत के कार्यक्रम

पं.गोपालकृष्ण
उस्ताद विलायत ख़ां साहब के अलावा मेरे वादन पर दिल्ली के विचित्रवीणा वादक पं.गोपालकृष्ण का भी प्रभाव पड़ा। पं.गोपालकृष्ण आकाशवाणी के ऑर्केस्ट्रा वाद्यवृन्दके डायरेक्टर थे। उन्हीं की देखरेख में आकाशवाणी दिल्ली से मेरे कार्यक्रम प्रसारित होने लगे। पं.गोपालकृष्ण मुझे अपना 'रेडियो वाला चेला' कहते थे। मैंने आकाशवाणी के 4 राष्ट्रीय कार्यक्रमों और 2 रेडियो संगीत सम्मेलन के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इसके अलावा 2 टी.वी. कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। आज मैं आकाशवाणी का वरिष्ठ कलाकारहूं।

साल 1985 में मैंने भारत सरकार की ओर से अमेरिका में आयोजित किए गए फ़ेस्टिवल ऑफ़ इण्डियामें शिरकत की, न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, मैरीलैण्ड विश्वविद्यालय, यू.सी.एल. (यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया एण्ड लॉस एंजेलस) में विचित्रवीणा वादन के कार्यक्रम प्रस्तुत किए। अमेरिका के अलावा फ़्रांस, स्वीट्ज़रलैण्ड, जर्मनी समेत यूरोप के कई देशों में आज भी मेरे कार्यक्रम होते रहते हैं।

भारत में होने वाले मेरे कार्यक्रमों में आई.टी.सी. (इंडियन टोबैको कम्पनी) की कोलकाता स्थित संगीत शोध अकादमीका कंसर्ट, ‘दिल्ली मॉडर्न स्कूलमें हर साल होने वाला संगीत महोत्सव, दिल्ली में ही साऊथ इंडियन एसोसिएशनद्वारा आयोजित वीणा महोत्सवके अलावा भारत भवन-भोपालमें साल 1982 में आयोजित अप्रचलित वाद्ययंत्र वादनमहोत्सव भी शामिल हैं। 
   
मारवा’, ‘जोग’, ‘किरवानी’, ‘अहीर भैरव’, ‘मालकौंस’, ‘भैरवी’, ‘यमनऔर दरबारीमेरे प्रिय राग हैं जिन्हें बजाने में मुझे आत्मिक आनंद मिलता है।

वीणाओं के प्रकार -

सहकर्मियों धर्मपाल जी (बाएं) और कुंदन सिंह नेगी जी (दाएं) के साथ
अजीत सिंह जी चीनी वाद्य 'यांगचंग' की मरम्मत करते हुए 
वीणाएं चार प्रकार की होती हैं, ‘चित्रवीणा’, ‘विचित्रवीणा’, ‘सरस्वतीवीणाऔर रूद्रवीणा इन सभी वीणाओं में दो तुम्बे लगे होते हैं। चित्रवीणा और सरस्वतीवीणा का प्रचलन मुख्यत: दक्षिण भारत और कर्नाटक संगीत में है तो विचित्रवीणा और रूद्रवीणा उत्तर भारत में बजाई जाती हैं। चित्रवीणा को गोटुवाद्यमभी कहा जाता है। चित्रवीणा और विचित्रवीणा में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है। इन दोनों ही वीणाओं में परदे नहीं होते और इन्हें ज़मीन पर रखकर बजाया जाता है। इनके वादन में दाएं हाथ की दो अंगुलियों, तर्जनी और मध्यमा में पहने मिज़राब और बाएं हाथ से गोटुका प्रयोग होता है। गोटुअर्थात पेपरवेट के आकार का, आमतौर पर आबनूस की लकड़ी से बना एक भारी और गोल टुकड़ा।

चित्रवीणा में 4 मुख्य तार और 3 चिकारी के तार लगे होते हैं। वहीं विचित्रवीणा में 4 मुख्य और चिकारी के तारों के अलावा 11 या 13 तरब के तार भी होते हैं।

सरस्वतीवीणा और रूद्रवीणा में सितार की तरह परदे होते हैं और इन दोनों ही में गोटुके बजाय अंगुलियों प्रयोग होता है। सरस्वती वीणा के अगले तुम्बे को गोद में और पीछे के तुम्बे को कन्धे पर रखकर बजाया जाता है तो वहीं रूद्रवीणा को बजाते समय उसका अगला तुम्बा ज़मीन पर और पीछे वाला तुम्बा कन्धे पर टिका होता है। सरस्वतीवीणा में तर्जनी और मध्यमा, दोनों के मिज़राबों का और रूद्रवीणा में केवल एक, तर्जनी के मिज़राब का इस्तेमाल होता है।

सरस्वतीवीणा में 4 मुख्य और 3 चिकारी के तार होते हैं। इसमें तरब के तार नहीं होते। वहीं रूद्रवीणा में 7 मुख्य और 13 तरब के तारों का प्रयोग किया जाता है।

मैं जो विचित्रवीणा बरसों से बजाता रहा हूं उसे कुछ संशोधनों के साथ मैंने ख़ुद ही तैयार किया है। इस विचित्रवीणा में मैंने 6 मुख्य और 3 चिकारी के तारों के अलावा 13 तरब के तारों का प्रयोग किया है। लकड़ी के बने 'गोटु' के स्थान पर मैं विलम्बित और मध्य लय बजाते समय पत्थर के और द्रुत लय में शीशे के 'गोटु' का इस्तेमाल करता हूं।



मेरा परिवार

संगीत साधना और कारोबार की ज़िम्मेदारियों में मैं इतना उलझा रहा कि विवाह का ख़्याल ही मन में नहीं आया। हम 5 भाई-बहनों में सबसे बड़ी बहन का देहांत 1970 के दशक के मध्य में हो गया था। मैं दूसरे नम्बर पर हूं। मुझसे छोटी बहन बृजपाल अनेजा जयपुर के महारानी गायत्री देवी पब्लिक स्कूल में डांस टीचर के पद से रिटायर हुईं। उनसे छोटा हमारा भाई कैप्टन अमरीक सिंह 1969 में फ़ौज की नौकरी छोड़ने के दो साल बाद, साल 1971 में कनाडा जाकर बस गया। अमरीक सिंह एक बेहतरीन प्यानो वादक हैं और पाश्चात्य संगीत में ख़ासा दखल रखते हैं। टोरंटो में 'हाऊस ऑफ़ रागा' नाम से उनका पाश्चात्य संगीतवाद्यों का बहुत बड़ा कारोबार है। सबसे छोटी बहन भी अब जीवित नहीं है। मेरी दत्तक पुत्री वैज्ञानिक और रिसर्च स्कॉलर है।
  
अंत में -   

वीणाओं का इतिहास बहुत पुराना है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव रूद्रवीणा बजाते थे और मां सरस्वती का तो दूसरा नाम ही वीणावादिनीहै। उधर आर्यवर्त के लिखित इतिहास में इस बात का उल्लेख मिलता है कि समुद्रगुप्त विभिन्न वीणाएं बजाया करते थे। सितार तो भारत में क़रीब 800 साल पहले अमीर खुसरो के समय में आया, वरना उससे पहले तो लोग वीणा ही बजाते थे। वीणा हमेशा से हमारी सांस्कृतिक परम्परा का अभिन्न अंग रही है। लेकिन आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। दक्षिण भारत में ज़रूर आज भी सरस्वतीवीणा मुख्यत: महिलाओं के हाथों जीवित है लेकिन अन्य वीणाओं के साथ ऐसा नहीं है। विचित्रवीणा के नाम पर भी आज पं.रमेश प्रेम, पं.श्रीकृष्ण शर्मा, डॉ.राधिका उम्देकर बुधकर और रागिनी त्रिवेदी जैसे गिनेचुने वादक-वादिकाएं ही याद आते हैं। आज लोगों को पता ही नहीं है कि वीणाक्या है!

कुछ समय पहले स्पिक मैकेने रूद्रवीणा बचाओकार्यक्रम किया था। लेकिन आज ज़रूरत वीणा बचाओके नारे की है। सरकार, संस्कृति विभाग और संगीत नाटक अकादमी के साथ साथ हम संगीतज्ञों का भी फ़र्ज़ बनता है कि वीणाओं की इस समृद्ध भारतीय परम्परा को लुप्त होने से बचाएं।

जहां तक मेरा सवाल है तो दम तोड़ती इस परम्परा को बचाए और जिलाए रखने की दिशा में मुझसे जो बन पड़ेगा मैं करूंगा। विचित्रवीणा की परम्परा को जीवित रखने के इच्छुकों को लागत मूल्य पर वीणा बनाकर दूंगा, उन्हें विचित्रवीणा वादन की नि:शुल्क शिक्षा दूंगा...

........लेकिन कोई नज़र तो आए !!!!!!!!!       
........................................................प्रस्तुति: शिशिर कृष्ण शर्मा 

1 comment:

  1. सुन्दर और जानकारियों भरा लेख। आभार हमें अजीत सिंह जी से मिलावाने के लिए जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस लुप्त हो रहे वाद्य को बचाने के लिए समर्पित कर दिया।

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