Saturday, 6 June 2015

“कैशोर्य की देहरी पर ठहरी हुई आवाज़" – शहनाज़ अख़्तरी

कैशोर्य की देहरी पर ठहरी हुई आवाज़" शहनाज़ अख़्तरी

मुलाक़ात –  विविध भारती की वरिष्ठ उद्घोषिका शहनाज़ अख़्तरी के साथ
कैशोर्य की देहरी पर ठहरी हुई आवाज़.......!!!

(शहनाज़ अख़्तरी)

“...प्रस्तुत है कार्यक्रम - सखी...सहेली!” 

- किशोरावस्था में कदम रख रही किसी बालिका की सी आवाज़... कुहुकती, कानों में रस घोलती, बेहद मीठी, मानों किसी ने हौले से संतूर छेड़ दिया हो... हर दोपहर 3 बजे विविध भारती पर

“....सभी सुनने वाली बहनों को शहनाज़ अख़्तरी का आदाब और नमस्कार....!

ये जादुई आवाज़ है विविध भारती की वरिष्ठ उद्घोषिका शहनाज़ अख़्तरी की, जिन्होंने हाल ही में व्यंग्योपासनाके साथ अपने जीवन के तमाम पहलुओं पर लंबी बातचीत की।

...प्रस्तुत है शहनाज़ अख़्तरी की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी...!!!

मेरा जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

मेरा जन्म 7 जनवरी 1958 को गोण्डा, उत्तरप्रदेश के तरबगंज क़स्बे में हुआ था। मेरे पूर्वज शाही परिवारों से थे। बस्ती के राजा इब्राहीम मेरे परदादा थे तो मेरे नाना के नाना यानि गाज़ीपुर के नवाब अब्दुल्ला का ताल्लुक़ कोलकाता के शाही ख़ानदान से था। मेरी दादी इराक़ की थीं। दादा शमीम पडरौना में मजिस्ट्रेट थे। उधर मेरे नाना ज़हीरूद्दीन हसन तहसीलदार थे जिनका ज़्यादातर समय बस्ती, गोण्डा, देवरिया और आज़मगढ़ की विभिन्न तहसीलों में गुज़रा था। मेरी नानी के पिता ज़हूर का ग़ाज़ीपुर में हीरे-जवाहरात का बहुत बड़ा कारोबार था। वो तुर्की के बादशाह के पोते थे। मेरा जन्म नाना के घर पर हुआ था, और उन दिनों उनकी पोस्टिंग तरबगंज में थी।

मेरे पिता दो भाई थे। बड़े वसीम थे जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे। वो पूर्वी पाकिस्तान की राजशाही यूनिवर्सिटी में रीडर बने। बांग्लादेश का निर्माण हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान जाकर पहले क्वेटा यूनिवर्सिटी में वाईस चांसलर का पद सम्भाल लिया। कुछ समय बाद वो कराची की हमदर्द यूनिवर्सिटी में चांसलर हो गए छोटे भाई नसीम मेरे पिता थे। बड़े भाई की पत्नी अनवरी बेगम और छोटे भाई की पत्नी यानि मेरी अम्मी सरवरी बेगम सगी बहनें थीं।

मैं 8-9 महिने की थी कि मेरे पिता पढ़ने के लिए लन्दन चले गए। अम्मी, मुझसे 3 साल बड़े मेरे भाई मोहम्मद नफ़ीस और मैं भारत में ही रह गए। पिता ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से एल.एल.एम. किया और फिर एंग्लो अफ़्रीकन शिपिंग कम्पनीमें ऊंचे ओहदे पर कम करने लगे। उन्हें पाकिस्तान और ब्रिटेन की (दोहरी) नागरिकता मिल गयी थी। उनकी योजना थी कि कुछ समय बाद वो हमें भी लन्दन बुला लेंगे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। ही वो भारत पाए और ही कभी हम उन्हें देख पाए। महज़ 36 साल की उम्र में लन्दन में ही उनका निधन हो गया।

मेरे छोटे भाई मोहम्मद वकील का जन्म पिता के लन्दन जाने के क़रीब 7-8 महिने बाद हुआ था।

मेरा बचपन, मेरी पढ़ाई

पिता के लन्दन चले जाने के बाद हम लोग नाना के साथ रहने लगे। नाना का ट्रांसफ़र होता रहता था, इसलिए मेरा बचपन पूर्वी उत्तरप्रदेश के बस्ती, देवरिया और आज़मगढ़ के मुसाफ़िरखाना, बांसी, नवगढ़ और लालगंज जैसे क़स्बों में बीता। हमारे नाना बेहद खुले विचारों के थे। वो चाहते थे कि हम आधुनिक शिक्षा लें और ख़ूब पढ़ें। मेरी शुरूआती पढ़ाई नाना के घर पर ही हुई जिसके बाद मुझे देवरिया कचहरी के पास स्थित नगरपालिका के स्कूल में 5वीं में दाख़िला दिला दिया गया। 6वीं मैंने लालगंज से और 7वीं-8वीं मिस्वां से की।


उधर हमारे दादा के विचार नाना से बिल्कुल अलग थे। वो सिर्फ़ धार्मिक शिक्षा के हिमायती थे। कभीकभार हम उनके पास भी आतेजाते रहते थे। दादा ने हमें धार्मिक शिक्षा दिलाई।

मेरे मामा मोबीन अहमद सिद्दीक़ी को शहडोल स्नातकोत्तर कॉलेजमें लेक्चरर की नौकरी मिली तो साल 1970 में हम लोग भी शहडोल (मध्यप्रदेश) चले आए। उधर मेरी मौसी डॉ.सुरैया जबीं भी, जो हिंदी साहित्य में एम.., साहित्यरत्न, विद्याविनोदिनी, पी.एच.डी. और एल.एल.बी. थीं, शहडोल कॉलेज में रीडर नियुक्त हो गयीं। 9वीं से आगे की पढ़ाई मैंने शहडोल में ही की। क्लास में मैं हमेशा अव्वल आती थी। साल 1977 में मैंने प्रथम श्रेणी में एम.एस.सी. प्राणीशास्त्र किया। आगे चलकर नौकरी में रहते मैंने बतौर प्राईवेट परीक्षार्थी एम..हिन्दी और एल.एल.बी. की डिग्रियां हासिल कीं।

कला की ओर रूझान

बचपन से ही मेरा झुकाव ललित कलाओं की तरफ़ था। मुझे कहानी लिखने का शौक़ था, मैं पेंटिंग करती थी, मूर्तियां बनाती थी, गाती थी, कुछ समय कथक भी सीखा। देवरिया में मैं स्कूल के नाटकों और बच्चों के स्टेज-कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थी। शहडोल आकर भी स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मेरी सक्रियता बनी रही, हालांकि 12वीं के बाद अम्मी ने मेरे नृत्य पर रोक लगा दी थी। कला की तरफ़ रूझान ही रेडियो की ओर मेरे आकर्षण की वजह बना।

सपना सच हुआ  -

कॉलेज में अंग्रेज़ी के मेरे प्रोफ़ेसर प्रहसन प्रकाश मेरे मामा के अच्छे दोस्त थे। एक रोज़ मैंने उनसे कहा कि मैं रेडियो अनाऊंसर बनना चाहती हूं। उन दिनों रीवां में हाल ही में खुले रेडियो स्टेशन पर विभिन्न पदों के लिए रिक्तियां निकली हुई थीं। रीवां रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर हेमेन्द्र माथुर इससे पहले रायपुर रेडियो पर थे। वो प्रहसन प्रकाश के साले निर्मल हेनरी के दोस्त थे जो रायपुर में रहते थे। निर्मल हेनरी ने मुझे हेमेन्द्र माथुर के नाम एक पत्र लिख कर दिया। मैं शहडोल से रीवां जाकर हेमेन्द्र माथुर से मिली। अपने साथ मैं रीवां रेडियो पर अनाऊंसर पद के लिए फ़ॉर्म भी भरकर ले गयी थी जिसे मैंने रेडियो स्टेशन पर जमा कर दिया।

हेमेन्द्र माथुर से मुलाक़ात अच्छी रही। मेरे साथ 15 रूपए प्रतिदिन के पारिश्रमिक पर 5 दिनों के लिए यूथ प्रोग्रामका कांट्रेक्ट साईन किया गया। रेडियो का मेरा ये पहला अनुभव सफल और उत्साहवर्धक रहा। 5 दिनों बाद जीवन की पहली कमाई के 75 रूपए लेकर मैं शहडोल वापस लौट आयी।

कुछ दिनों बाद मुझे लिखित परीक्षा के लिए बुलाया गया। इस बात पर नानी बेहद नाराज़ हुईं। वो मेरे नौकरी करने के पक्ष में नहीं थीं। लेकिन अम्मी ने मेरा पूरा साथ दिया। रीवां जाकर मैंने लिखित परीक्षा के बाद ऑडिशन में हिस्सा लिया। चूंकि पढ़ने का शौक़ मुझे बचपन से ही था और बिमल मित्र, ताराचंद बन्दोपाध्याय जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ ही मौसी की बी.. लिटरेचर की भी तमाम क़िताबें मैं पढ़ चुकी थी इसलिए भाषा पर मेरी अच्छी पकड़ थी। नतीजतन रेडियो की लिखित परीक्षा और ऑडिशन में मेरे लिए सभी कुछ आसान होता चला गया।

........रेडियो अनाऊंसर बनने का मेरा सपना सच हो गया था।




रेडियो का सफ़र

जुलाई 1978 में मैंने रीवां रेडियो से नौकरी की शुरूआत की। अगले 8 सालों में मैंने कई रेडियो नाटकों में हिस्सा लिया। उस दौर के हिट रेडियो धारावाहिक घर की बातेंमें मैंने भाभी की भूमिका निभाई जिसे श्रोताओं ने बेहद पसन्द किया। बाल मंडली’, ‘युववाणी’, ‘विज्ञान पत्रिकाऔर गीतों भरी कहानीके साथसाथ रीवां रेडियो के मेरे द्वारा प्रस्तुत महिलाओं के कार्यक्रम भी बेहद सराहे गए। इसके अलावा आकाशवाणी द्वारा आयोजित सुगम संगीत, ग़ज़ल, भजन और शास्त्रीय संगीत के स्टेज कार्यक्रमों के मंच संचालन की ज़िम्मेदारी भी मैं लगातार निभाती रही।

......रीवां रेडियो के मेरे वो 9 बरस मेरी ज़िंदगी का स्वर्णकाल थे।

सितम्बर 1987 में मेरा ट्रांसफ़र जबलपुर कर दिया गया। जबलपुर रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा ने मुझे बहुत अच्छे कार्यक्रम सौंपे। मैं स्क्रिप्ट लिखती थी, गांव-गांव जाकर लोगों से बातचीत करती थी और उस बातचीत के आधार पर कार्यक्रम तैयार करती थी। इसके अलावा आकाशवाणी के सालभर के ब्यौरे की प्रस्तुति के कार्यक्रम का मंच संचालन भी मेरे ही ज़िम्मे था। जबलपुर रेडियो पर मैं 5 साल रही।

विविध भारती 

साल 1992 में मुम्बई के एक कारोबारी, कश्मीरी युवक से मेरा रिश्ता तय हुआ। वो रिश्ता तो हालांकि आगे नहीं बढ़ पाया लेकिन तब तक मुम्बई  ट्रांसफ़र के मेरे आवेदन पर कार्यवाही हो चुकी थी। अक्टूबर 1992 में  मुझे जबलपुर से मुम्बई, विविध भारती सेवा में भेज दिया गया। अब पिछले 23 सालों से मैं विविध भारती में कार्यरत हूं। मेरे द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले कार्यक्रमों में छायागीत’, ‘एक फ़नकारऔर रोज़ दोपहर 3 से 4 बजे तक प्रसारित होने वाला महिलाओं का कार्यक्रम सखी सहेलीप्रमुख हैं।

पति के साथ 
मेरा घर, मेरा परिवार  -

साल 2005 में मेरी शादी हुई। चरारे शरीफ़ के रहने वाले मेरे पति जम्मू-कश्मीर को-ऑपरेटिव बैंक में डिविज़नल मैनेजर हैं और श्रीनगर-कश्मीर में रहते हैं। मेरी अम्मी और शहडोल पोलिटेक्नीक कॉलेज से लेक्चरर पद से सेवानिवृत्त मेरे बड़े भाई मोहम्मद नफ़ीस मुम्बई में मेरे साथ रहते हैं। छोटा भाई मोहम्मद वक़ील शहडोल में, कलेक्ट्रेट में नौकरी करता है।

...... रेडियो का मेरा सफ़र अब अपने अंतिम चरण में है। 40 बरस की नौकरी के बाद जुलाई 2018 में मैं सेवा से निवृत्त कर दी जाऊंगी।
...........................................................प्रस्तुति : शिशिर कृष्ण शर्मा  

2 comments:

  1. शहनाज जी कें बारें में जानकर बहोत अच्छा लगा। मैं उनके लंबे स्वस्थ जीवन की कामना करता हूं।

    ReplyDelete
  2. Shahnaaz ji se aap ki bhent aur baatcheet par aadhaarit yah lekh bahut hi sundar hai. Basti, Baansi, NavGadh aadi naam mere parichit hain kyon ki idhar se bhi mera rishta rahaa hai, isliye kuchh aur apnepan ka ehsaas hua. Shahnaaz ji ke liye mangal kaamnaayein.

    ReplyDelete