Tuesday, 20 October 2015

"बंदर मामा पहन पाजामा दावत खाने आए"

"बंदर मामा पहन पाजामा दावत खाने आए"

                        ………शिशिर कृष्ण शर्मा

सिमटी सी, सकुचाई सी, शर्माती हुई सी बालिकाएं...पारम्परिक परिधानों में सजी-धजी...इस एहसास के साथ कि 'सृष्टि का केन्द्र बस आज मैं ही हूं और राह से गुज़रती हर एक आंख बस मुझ पर ही गड़ी हुई है' !...चाल में ग़ज़ब की नज़ाक़त पैदा करता, कुछ तो मन:स्थिति का और काफ़ी कुछ हाई हील का कमाल...हरेक बालिका के पीछे-पीछे कन्धे पर लाडली बिटिया का बड़ा सा स्कूली बस्ता टांगे, घिसटता हुआ सा बेचारा बाप !!!

ये दृश्य था आज सुबह पत्नी के स्कूल की ओर जाने वाली सड़क का, आज स्कूल में छात्र-छात्राएं गरबा-डांडिया खेलेंगे और जहां भारतीय भाषाएं बोलने तक पर पाबंदी हो, वहां आज वो अपनी जड़ों से जुड़ेंगे !!!

एकाएक अपना बचपन याद गया। छोटी छोटी पहाड़ियों और उनके बीच मौजूद घाटियों और जंगलों को ख़ुद में समेटे, कई वर्ग-किलोमीटर में फैली देहरादून की हमारी सर्वे ऑफ़ इंडिया की कॉलोनी, "हाथीबड़कला एस्टेट"!...कॉलोनी के घाटीनुमा हिस्से में बना केन्द्रीय विद्यालय, जो उस जगह से शिफ़्ट कर दिए जाने और पुरानी इमारत के खण्डहर में तब्दील हो जाने के बावजूद आज भी 'खड्डे वाला स्कूल' के नाम से कहीं ज़्यादा मशहूर है...खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन विद्यालय से क़रीब आधा किलोमीटर दूर घाटी से ऊपर मौजूद कॉलोनी के बड़े मैदान में किया जाता था...1968-69 में मैंने स्कूल के सालाना सांस्कृतिक कार्यक्रम में फ़ैंसीड्रेस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था, उस वक़्त मैं शायद पहली या दूसरी में रहा होऊंगा।

उस प्रतियोगिता में मैं बंदर बना था..............!!!

हमसे बहुत-बहुत सीनियर, 10वीं - 11वीं में पढ़ने वाली पूनम (शर्मा) और बीना (ठाकुर) दीदी ने मुझे जमकर सजाया-संवारा... अपनी तमाम कला को उड़ेलकर रख देने के लिए वो शायद इसी मौक़े का इंतज़ार कर रही थीं...मेरे मुंह पर उन्होंने सफ़ेदी पोती, होंठों के चारों ओर लिपिस्टिक से बड़ा सा लाल गोला बनाया, काजल लगाई, मुझे पाजामा पहनाया और अंत में रद्दी अख़बारों को मोड़-मरोड़कर उनपर कसकर लपेटी गयी सुतली से बनी लम्बी सी पूंछ से सुसज्जित करके मेरी बेपनाह ख़ूबसूरती में चार चांद लगा दिए।

प्रतियोगिता में कूद पड़ने के लिए बंदर अब पूरी तरह से तैयार था...कविता पढ़ने वाला बंदर - "बंदर मामा पहन पाजामा दावत खाने आए..." !!!!!!

स्कूल से मैदान तक के उस आधा किलोमीटर के फ़ासले को तय करते समय सृष्टि का केन्द्र बस मैं ही था और राह से गुज़रती हर एक आंख बस मुझ पर ही गड़ी हुई थी। अपार प्रसन्नता, उत्साह और गर्व के उस मिलेजुले एहसास को शब्दों में बयां कर पाना असम्भव है !...पीछे पीछे 'बंदर बंदर' चिल्लाते कॉलोनी के बच्चे...मेरी पूंछ को छूने-पकड़ने की कोशिश करते हुए...और आगे आगे मैं...फूलकर कुप्पा होता हुआ...'सृष्टि का केन्द्र' - मैं !!!

उस घटना के बाद स्कूल में ही नहीं बल्कि कॉलोनी में भी कई सालों तक मुझे 'बंदर' कहकर पुकारा जाता रहा !!!
....................................................................................................................
(मूलत: फ़ेसबुक पोस्ट : दिनांक 19.10.2015)

No comments:

Post a Comment